शनिवार, 26 नवंबर 2011

देश के खुदरा व्यापारी हो जाएंगे बेरोजगार


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी देना देश के हित में नहीं है। केंद्र सरकार को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।

केंद्र सरकार के काम करने के तौर-तरीकों का यदि ऊपरी तौर पर ही विश्लेषण किया जाए, तो पता चल जाता है कि देश हित से जुड़े मामलों में निर्णय लेने से वह बचती है, जबकि मामला अगर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों से जुड़ा हो, तो उसके निर्णय लेने की रफ्तार राकेट की गति को भी मात दे देती है। हमने देखा कि भारत -अमेरिका असैन्य परमाणु करार प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने अपनी सरकार दांव पर लगाकर भी संसद में पारित करा दिया था। यह मसला भारत को परमाणु रिएक्टर बेचने के लिए उतावली विदेशी कंपनियों के हितों से सीधा जुड़ा हुआ था, तो हम यह भी देख रहे हैं कि एक सशक्त लोकपाल लाने के मामले में लगातार आनाकानी की जा रही है, क्योंकि यह मसला देश हितों से जुड़ा हुआ है। गुरुवार को हमने यह भी देखा कि देश के खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, अंग्रेजी में कहें तो फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (एफडीआई) की अनुमति देने का निर्णय हमारी केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने बीस मिनट से भी कम समय में ले लिया।
इस निर्णय के बाद जहां एक कंपनी विशेष के उत्पाद बेचने वाली दुकानों में सौ फीसदी विदेशी निवेश हो सकेगा, तो वहीं एक से अधिक कंपनियों के उत्पाद बेचने वाली दुकानों में 51 फीसदी। यह नियम तो देश में पहले से ही मौजूद है कि निवेशक यदि किसी व्यापारिक संस्थान-कंपनी की 51 फीसदी हिस्सेदारी खरीद लेता है, तो निवेशक ही उसका मालिक बन जाता है। यानी, सरकार ने सौ फीसदी और 51 फीसदी के जिस गणित में हमें उलझाया है, उसमें उलझने की कोई जरूरत नहीं। खुदरा व्यापार में एफडीआई की अनुमति का मतलब यह है कि सरकार ने कैरफोर, वालमार्ट और टेस्को जैसी बड़ी कंपनियों के स्वागत में तोरण द्वार सजा दिए हैं। सवाल यह है कि इसका परिणाम क्या होगा?
सरकार को तो लगता है कि उसके इस एक कदम से देश की सभी दिक्कतें दूर होने जा रही हैं। बाजार में बिचौलिए नहीं होंगे, तो महंगाई कम होगी। विदेशी दुकानें आएंगी, तो देश में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और वे अपने साथ पूंजी भी लाएंगी, जिससे देश की तरक्की हो सकेगी। मगर, यह सब छलावा है। होना यह है कि विदेशी दुकानों से हमारे छोटे दुकानदार प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे। अत: वे बेरोजगार हो जाएंगे। जब हमारे खुदरा व्यापारी बाजार से बेदखल हो जाएंगे, तो विदेशी दुकानों का बाजार पर शिकंजा कस जाएगा। तब ये मनमाना मुनाफा कमाएंगी। यानी, इससे देश का नुकसान ही नुकसान है, तो भी यह निर्णय ले लिया गया।

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