मंगलवार, 22 नवंबर 2011

ताकि भ्रष्टाचारियों को मिल सके कठोर दंड




- राजेन्द्र चतुर्वेदी


अदालत ने सुखराम को पांच वर्ष की कैद और चार लाख के जुर्माने की सजा सुनाकर देश को संदेश दिया है कि भ्रष्टाचारी बच नहीं सकते।
निश्चित ही दिल्ली की विशेष अदालत का फैसला देर से आया। एक कंपनी को गलत तरीके से केबल की आपूर्ति करने का ठेका देने का आरोप पं. सुखराम पर वर्ष-1996 में तब लगा था, जब वह दिवंगत प्रधानमंत्री नरसिंह राव की सरकार में संचार मंत्री हुआ करते थे। इसी मामले में सीबीआई की विशेष अदालत ने शनिवार को उन्हें पांच वर्ष की सजा सुनाई और उन पर चार लाख रुपए का जुर्माना लगाया। यदि यह फैसला आरोप लगने के दो-तीन वर्ष बाद ही आया होता, तो देश को भारी सुकून मिलता। सुकून तो अब भी मिला है, पर इसमें वह बात नहीं रही। बहरहाल, सुखराम के भ्रष्ट आचरण की कुंडली यदि बनाई जाए, तो यह तीसरा मामला है, जिसमें अदालतों ने उन्हें सजा के योग्य पाया है। वर्ष-2009 में भी उन्हें आय से अधिक संपत्ति के मामले में तीन वर्ष की सजा सुनाई जा चुकी है, तो इससे पहले 2002 में भी एक अन्य मामले में उनको सजा सुनाई जा चुकी है।
जो भी हो, पर शनिवार को जो फैसला आया है, उसके बाद पूरी शिद्दत से महसूस किया जा रहा है कि अब वह वक्त आ चुका है, जब सरकार ऐसा कुछ करे, जिससे देश की जनता को त्वरित न्याय मिले। हमारी अदालतों पर काम का बहुत बोझ है, लिहाजा महत्वपूर्ण मुकदमों की सुनवाई में भी बहुत देर लगती है। यानी, जजों की कमी को दूर करने के ईमानदार प्रयास अब बहुत जरूरी हैं। दूसरा विचारणीय मुद्दा सजा से उपजा है। कुछ लोगों को महसूस होता है कि सुखराम को सजा कम मिली है। उन पर आरोप साढ़े चार करोड़ के घोटाले का था, पर सजा मिली है, पांच वर्ष की जेल और चार लाख के जुर्माने की, जो गुनाह की तुलना में कम मानी जा रही है। अत: सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में सजा में भी इजाफा करे। जाहिर है कि यह दोनों जरूरी काम न्यायपालिका को नहीं, सरकार को करने हैं।

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