शनिवार, 26 नवंबर 2011

संसद में एक बार फिर वही का वही हंगामा

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

अन्ना के अनशन के दौरान कहा गया था कि वे संसद की सर्वोच्चता को चुनौती दे रहे हैं। तब संसद में हंगामा होने को क्या माना जाए?


संसद का शीतकालीन सत्र प्रारंभ हुए बुधवार को दो दिन पूरे हो चुके हैं और यदि हम इन दोनों ही दिनों के आधार पर संसद के पूरे सत्र की भविष्यवाणी करना चाहें, तो कह सकते हैं कि आसार कुछ अच्छे नहीं हैं। सत्र शुरू होने के करीब एक हफ्ते पहले से ही लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार सक्रिय हो गई थीं व विपक्ष भी काफी रचनात्मक संकेत दे रहा था। लिहाजा, लगता था कि इस सत्र में संसद की कार्यवाही सुचारू चलेगी, मगर विपक्ष के तेवरों में कोई कमी नहीं आई। वामपंथी दल चाहते हैं कि सरकार महंगाई पर काम रोककर चर्चा कराए, जबकि सरकार चाहती है कि यह चर्चा नियम-193 के तहत हो, ताकि मतदान की नौबत न आए। इधर, इस मुद्दे पर प्राय: पूरा विपक्ष तो वामदलों के साथ खड़ा है ही। इसका परिणाम यह है कि संसद में गतिरोध बरकरार है।
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने भी टूजी स्पेक्ट्रम घोटाला मामले में गृह मंत्री पी. चिदंबरम के बहिष्कार का ऐलान कर रखा है। यह वैसा ही है, जैसा एनडीए के शासन के दौरान तब के रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज का बहिष्कार कांग्रेस ने किया था, ताबूत घोटाला मामले में। यानी, हंगामा रुकने की संभावना कम ही है। यह तो हमें पता ही है कि संसद के शीतकालीन सत्र में 31 विधेयकों पर बहस होनी है। इनमें लोकपाल जैसे कई महत्वपूर्ण विधेयक शामिल हैं। संसद इस सत्र में कुल 21 दिन काम करेगी, जिनमें से दो दिन बर्बाद हो चुके हैं और यदि यह सिलसिला यूं ही चलता रहा, तो जाहिर है कि या तो विधेयक अटक जाएंगे या फिर अंत में उन्हें बिना बहस के ही पारित करा दिया जाएगा और यह दोनों ही स्थितियां संसदीय लोकतंत्र के हित में नहीं होंगी।
सत्तापक्ष व विपक्ष, दोनों थोड़े-थोड़े झुकें और संसद में काम होने दें। सरकार को महंगाई पर वामदलों का काम रोको प्रस्ताव मंजूर कर ही लेना चाहिए। इससे ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? यही कि मतदान के समय उसके सहयोगी बिदक गए, तो वह अल्पमत में आ जाएगी और लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हो जाएगा, तो हो जाने दें न। देश भी यही चाहता है कि सरकार या तो जनता की अपेक्षाएं पूरी करे या फिर जाए। सरकार इन दोनों में से किसी के लिए भी यदि तैयार नहीं है, तो यह सही नहीं। विपक्ष भी संयम बरते और संसद में काम होने दे। पिछले दिनों अन्ना के अनशन के दौरान सुनने को मिला था कि वे संसद की सर्वोच्चता को चुनौती दे रहे हैं। क्या संसद सत्रों को हंगामों की भेट चढ़ाना भी संसद की सर्वोच्चता के साथ खिलवाड़ नहीं है?

रेलगाडिय़ां दौड़ रही हैं भगवान के भरोसे


जरूरत रेलयात्राओं को निरापद बनाने की है, पर रेलवे हर हादसे के बाद मृतकों के परिजनों को मुआवजा देना ही अपना फर्ज मान बैठा है।
सोमवार को देर रात हावड़ा से चलकर देहरादून जा रही दून एक्सप्रेस के दो वातानुकूलित डिब्बों, बी-1 और बी-2 में आग लग गई, झारखंड के गिरिडीह जिले में। दोनों डिब्बों में 125 से ज्यादा यात्री मौजूद थे और पूरी ट्रेन तो खैर खचाखच भरी ही थी, वैसी ही, जैसी कि हमारी रेलगाडिय़ां भरी होती हैं। उन यात्रियों की सूझबूझ की तारीफ करनी होगी, जिन्होंने बी-1 में उठ रहा धुआं देखकर अग्निकांड की आशंका को भांप लिया और जंजीर खींच कर गाड़ी रोक दी। जानकारों का मानना है कि अगर इस कार्य में 10 से 15 मिनट की देर हो जाती, तो क्या पता कितने डिब्बे जल जाते व कितने रेलयात्री इस अग्निकांड की भेंट चढ़ जाते? वैसे, सात लोगों की मौत भी कम नहीं होती, तो भी गनीमत बहुत रही। हां, रेल-प्रबंधन और रेल मंत्रालय से यह सवाल जरूर पूछा ही जाना चाहिए कि दुनिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क आखिर इस तरह की 'गनीमतोंÓ के सहारे कब तक चलता रहेगा?
रेलगाडिय़ां रोज करीब सवा करोड़ यात्रियों को इधर से उधर करती हैं। इसके बाद भी रेलगाडिय़ों की सुरक्षा की स्थिति इतनी लचर है कि देश में प्रतिवर्ष करीब तीन सौ छोटी-बड़ी दुर्घटनाएं होती हैं। वर्ष-2011 में ही अब तक करीब ढाई सैकड़ा दुर्घटनाएं हो चुकी हैं और इनमें से 14 दुर्घटनाएं तो बहुत बड़ी थीं। अभी जुलाई के महीने में ही कानपुर के निकट कालका मेल पटरी से उतर गई थी, जिसमें 70 यात्रियों की मौत हो गई थी। इसी वर्ष अब तक तीन बार रेलगाडिय़ों में अग्निकांड भी हो चुका है, पर यह बात अलग है कि गनीमत उनमें भी रही। यानी, जरूरत रेल-यात्राओं को निरापद बनाने की है, पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। यह इसलिए कि रेल मंत्रालय हर हादसे के बाद मृतकों के परिजनों को मुआवजा देना ही अपना फर्ज मान बैठा है। वह रेल हादसों को रोकने वाले कदम उठाने पर विश्वास नहीं करता।

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