शनिवार, 26 नवंबर 2011

मिस्र का भविष्य अभी कोई नहीं बता सकता

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

आगे मिस्र की दशा और दिशा क्या होगी, अभी यह कोई नहीं बता सकता? फिलहाल तो वहां जनता सैन्य शासन के खिलाफ सड़कों पर है।
मिस्र की राजधानी काहिरा का तहरीर चौक क्रांति का प्रतीक बन चुका है। फिलहाल, नौ महीने के बाद एक बार फिर वहां लाखों मिस्रवासी इकट्ठे हैं। नजारा कुछ वैसा ही है, जैसा इसी वर्ष फरवरी के महीने में तब देखने को मिला था, जब लोग हुस्नी मुबारक की तीस वर्ष पुरानी सत्ता को उखाड़-फेंकने के लिए जुटे हुए थे। मुबारक तो खैर जेल में हैं, लेकिन क्रांति की सफलता से अलग मिस्र की जनता को यह सच नौ महीने में ही समझ में आ गया है कि उसके साथ धोखा हुआ है। लोगों को महसूस हो रहा है कि मुबारक को बेदखल करके सत्ता पर काबिज होने वाली सुप्रीम काउंसिल ऑफ आम्र्ड फोर्स (एससीएएफ) भी उनके साथ वही करना चाह रही है, जो मुबाकर तीस वर्ष तक करते रहे।
दरअसल, एससीएएफ ने मिस्र की कमान संभालते ही घोषणा कर दी थी कि वह छह महीने के अंदर नागरिक सरकार को सत्ता सौंप देगी, लेकिन अब उसने अपना इरादा बदल दिया है। वैसे वह जनता के दबाव में तो है, मगर लगता है कि सत्ता के हस्तांतरण में वह अभी छह महीने से ज्यादा का समय और लगा देगी। फौज की हुकूमत पर संदेह इसलिए भी होता है कि मौजूदा प्रधानमंत्री एसाम शराफ के इस्तीफे के बाद एक तरफ तो सेना प्रमुख मोहम्मद हुसैन तंतानी राष्ट्रपति का चुनाव जल्द ही कराने का वादा कर रहे हैं, तो वहीं उन्होंने यह भी कहा कि वे इसके लिए जनमत संग्रह कराएंगे कि आखिरकार मिस्र की जनता कैसी हुकूमत चाहती है?
निश्चित ही तंतानी यदि जनमत संग्रह कराने में सफल हो गए, तो चूंकि वह संगीनों के साए में होगा, इसलिए उसका परिणाम भी यही निकलेगा कि जनता लोकतंत्र नहीं, बल्कि सैनिक शासन ही चाहती है। मत इधर से उधर कराना या फर्जी मतदान करा अपनी तानाशाही पर जनता की मुहर लगवाने का काम मिस्र की फौज के लिए कोई बहुत कठिन काम नहीं है। फिर, फील्ड मार्शल तंतानी वही शख्सियत हैं, जिनकी नियुक्ति हुस्नी मुबारक ने की थी। यह बात अलग है कि फरवरी में जनता जब मुबारक के खिलाफ खड़ी हो गई थी, तो तंतानी ने फौज को उस पर गोलियां न चलाने का आदेश दिया था। तब लगता था कि वे जनता के समर्थन में हैं, पर अब लगने लगा है कि वह मुबारक को हटाकर खुद सत्ता में आने का मौका ढूंढ रहे थे। ऐसे में जनता का गुस्सा स्वाभाविक है, तो भी मिस्र की राह बहुत आसान नहीं है। रास्ता आसान तब होगा, जब आंदोलनकारी स्वयं मिस्र की भावी सत्ता का खाका खींचेंगे, लेकिन फिलहाल तो वह तहरीर चौक में जमे हुए हैं।

सिरफिरों को तवज्जो देना बंद करे मीडिया

शरद पवार को चांटा मारने की घटना की तीखे शब्दों में भत्र्सना की जाए, साथ ही पता लगाया जाए कि ऐसी घटनाओं की वजह क्या है?
केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को चांटा मारने की घटना की तीखे शब्दों में भत्र्सना तो होनी ही चाहिए, साथ ही विचार इस पर भी होना चाहिए कि देश में ऐसी घटनाएं अब ज्यादा क्यों होने लगी हैं? अभी कितने दिन हुए, जब ऐसी ही घटना टीम अन्ना के एक प्रमुख सदस्य अरविंद केजरीवाल के साथ लखनऊ में हुई थी। वहीं, प्रशांत भूषण के साथ हाथापाई तो सुप्रीम कोर्ट स्थित उनके चेंबर में कर दी गई थी। थोड़ा और पीछे मुड़कर देखें, तो वर्ष-2009 के लोकसभा चुनाव से पहले पी. चिदंबरम पर जूता भी फेंका गया था। इन घटनाओं के कारण जरूर अलग-अलग बताए गए हैं। मसलन-चिदंबरम पर जूता फेंकने वाला युवक वर्ष -1984 के सिख विरोधी दंगों के कारण क्षुब्ध था, तो प्रशांत भूषण को पीटने वाले युवक कश्मीर पर आए उनके एक बयान के कारण। अरविंद केजरीवाल के साथ वारदात होने का कारण यह बताया गया था कि जिस युवक ने वारदात को अंजाम दिया था, वह अन्ना के आंदोलन का विरोधी था, तो अब पवार को चांटा मारने का कारण यह बताया जा रहा है कि चांटा मारने वाला युवक पवार का ध्यान महंगाई से जूझते देश की ओर आकर्षित करना चाहता था। यानी, इन सभी घटनाओं के कारण अलग-अलग तो बताए जा रहे हैं, पर उनमें एक समानता भी है।
ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले युवक जहां साधारण पृष्ठ -भूमि के हैं, तो वहीं जिनको निशाना बनाया गया है, वे सब लोग देश की नामचीन हस्तियां हैं। इस आधार पर निष्कर्ष यह निकल सकता है कि ऐसा उपद्रव प्रसिद्ध (?) होने के लिए किया जाता है। यह इसलिए कि ऐसी घटनाओं को अंजाम देने वाले लोगों को मीडिया में भी जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी जाती है। पवार के साथ जो हुआ, उसके बाद पहला संकल्प मीडिया को ही लेना होगा कि वह सिरफिरों को बिलकुल भी तरजीह नहीं देगा।

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