शनिवार, 26 नवंबर 2011

किशनजी की मौत के बाद सतर्कता जरूरी


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

किशनजी की मौत माओवादियों के लिए तगड़ा झटका है, तो देश के लिए एक खुशखबरी, पर इसके बाद माओवादी और हिंसक हो सकते हैं।


पश्चिम बंगाल पुलिस ने गुरुवार को पश्चिम मिदनापुर जिले के बाड़ीसोल जंगल में माओवादी नेता किशनजी को मार गिराया है। निश्चित ही मोलाजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशनजी की मौत माओवादी उग्रवाद को एक करारा झटका है, तो यह देश के लिए भी एक उम्दा खबर है। दरअसल, आंध्रप्रदेश के करीमनगर जिले में 24 नवंबर को जन्मा किशनजी पिछले तीस वर्षों से हिंसा के रास्ते पर चल रहा था। चारू मजूमदार की मौत के बाद अस्सी के दशक में नक्सलवादी आंदोलन छह गुटों में विभक्त हो गया था। अत: कमजोर भी बहुत पड़ गया था। यह किशनजी के शरारती दिमाग में ही वर्ष-1989 में पहली बार आया कि सभी नक्सली गुटों को एकजुट किया जाए। इसके लिए उसने विधिवत प्रयास किए और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन किया। फिर, उसने पहले पीपुल्स वार गु्रप व माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर जैसे हिंसक संगठनों का विलय अपनी पार्टी में कराया और बाद में अन्य छोटे-छोटे गिरोहों का। इस प्रकार, नक्सली आंदोलन पूरी तरह खत्म हो गया व उसकी जगह माओवाद ने ले ली।
इसी के साथ माओवादी कुछ ज्यादा हिंसक भी हो उठे। अभी कोई भी दिन ऐसा नहीं गुजरता, जब माओवाद प्रभावित इलाकों में माओवादी किसी छोटी-बड़ी वारदात को अंजाम न देते हों। वैसे किशनजी प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का दूसरे नंबर का नेता था, लेकिन माना यह जाता है कि हिंसा के पीछे उसी का दिमाग हुआ करता था। यह हमारी खुफिया एजेंसियों की भी महानता है कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि पहले नंबर का माओवादी नेता कौन है? इसके बावजूद, किशनजी की मौत इस हिंसक आंदोलन के लिए एक तगड़ा झटका है। अलबत्ता, किशन का खात्मा माओवाद का खात्मा नहीं है, इसलिए उसकी मौत के बाद देश को कुछ ज्यादा ही सतर्क और चौकन्ना रहना होगा।

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