गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

देश की मंशा से मेल नहीं खाता ये मसौदा

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

सामने आ रहे तथ्य यदि सही हैं, तो कहा जा सकता है कि सरकार जो लोकपाल ला रही है, वह भ्रष्टाचारियों को दंड नहीं दिला पाएगा।

सरकार के 'ताकतवरÓ लोकपाल का संसद की स्थायी समिति द्वारा तैयार किया गया मसौदा अभी अधिकृत तौर पर सामने नहीं आया है, पर उसके कुछ अंश बाहर निकल आए हैं। कहा जा रहा है कि इस मसौदे में न तो प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में रखा गया है, न ही सांसदों के उस आचरण को भी, जो वे संसद में करते हैं। निचले स्तर के अधिकारी लोकपाल के दायरे से बाहर हैं, तो राज्यों में लोकायुक्त के गठन के प्रावधान में भी कई छेद छोड़ दिए गए। इस मसौदे के अनुसार, राज्यों में लोकायुक्त नाम की एक संस्था तो बनेगी, लेकिन उसमें चार-पांच सदस्य होंगे, जिनका मुख्यालय राजधानियों में होगा और जो सभी तरह के भ्रष्टाचारों की जांच करेंगे। यानी, लोकपाल विधेयक के संदर्भ में सामने आए यह सब तथ्य यदि सही हैं, तो इस निष्कर्ष पर पहुंचना भी सही है कि सरकार एक ऐसा लोकपाल बनाना चाहती है, जो कुर्सी पर बैठा तो दिखे, मगर हो किसी मतलब का नहीं।
चूंकि सीबीआई भी लोकपाल के दायरे से बाहर रहेगी और सतर्कता विभाग भी, इसलिए डर यह भी पैदा हो गया है कि कहीं यह लोकपाल भ्रष्टाचार के मामलों को उलझाने वाला भी साबित न हो? कैसे? जैसे-भ्रष्टाचार का कोई मामला जब अभी सामने आता है, तो उसकी कम से कम दो एजेंसियां तो जांच करती ही हैं और कभी-कभी जांच एजेंसियों की संख्या दो से ज्यादा भी होती है। मसलन-टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले का भंडाफोड़ सबसे पहले कैग (नियंत्रक और महालेखा परीक्षक) ने किया था। फिर, इसकी जांच सतर्कता विभाग, दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा और सीबीआई से कराई गई थी। मतलब, मामला एक, पर उसकी जांच के लिए तीन एजेंसियां अलग-अलग लगा दी गईं। यह बात अलग है कि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने मामला अपने हाथ में लेकर सभी को एक कोने में बैठा दिया और सिर्फ सीबीआई से जांच कराई, वह भी अपनी निगरानी में, तभी कुछ सार्थक नतीजे निकले।
यदि इस मामले की तीनों एजेंसियां अलग-अलग जांच करतीं, तो क्या होता? तीनों के नतीजे आपस में मेल नहीं खाते, इसलिए मामला कमजोर पड़ जाता। यह जो लोकपाल बनेगा, वह सरकार के पास पांचवीं जांच एजेंसी होगा और किसी एक मामले की जांच जब कई एजेंसियां अलग-अलग करेंगी, तो जांच का कैसा कचरा होगा, इसको समझा जा सकता है। तभी देश चाहता है कि एक सक्षम-स्वायत्त जांच एजेंसी का गठन हो, पर स्थायी समिति का लोकपाल का मसौदा देश की इस मंशा से मेल नहीं खाता?

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