मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

आर्थिक असमानता में बढ़ोतरी चिंताजनक

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

ओईसीडी की ताजा रिपोर्ट बता रही है कि देश में 1992 के बाद आर्थिक असमानता बहुत बढ़ गई है। यह तथ्य निश्चित ही चिंताजनक है।
नव उदारवाद, भूमंडलीकरण और मुक्त अर्थव्यवस्था के जाने -माने पैरोकार तो यही कहते हैं कि जब से अपना देश इन नीतियों पर चला है, तब से अर्थव्यवस्था उस खराब दौर से बाहर आ गई है, जो वर्ष-1990 तक चलता आया था। संभव है कि उनकी इस बात में दम हो, मगर इस सच को अस्वीकार करना तो गलत होगा कि भूमंडलीकरण ने अर्थव्यवस्था को चाहे कितना भी ऊंचा क्यों न उठा दिया हो, इसका लाभ सभी को नहीं मिला है, इसीलिए देश में गरीब और अमीर के बीच की खाई कुछ ज्यादा ही चौड़ी हो गई है। ऐसा हम नहीं, बल्कि उस आर्थिक सहयोग व विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट कह रही है, जो चूंकि स्वयं ही अमीर देशों का जमावड़ा है, लिहाजा आर्थिक समानता-प्रेमी भी नहीं है। यानी, ओईसीडी जैसा पूंजीवादी संगठन भारत में आर्थिक असमानता बढऩे की बात यदि कह रहा है और बता रहा है कि इसका कारण पूंजीवाद है, तो इस पर विचार तो किया ही जाना चाहिए।
रिपोर्ट बता रही है कि 1992 से पहले अपने देश में सबसे ऊंचे और सबसे निचले लोगों की आय में सिर्फ दो गुने का फर्क था, जो अब बढ़कर 12 गुना हो गया है। मतलब, 1992 से पहले यदि उच्च आयवर्ग के लोग बीस रुपए रोज कमाते थे, तो निम्न आय वर्ग के लोग दस रुपए कमा लेते थे, जबकि अब यदि निम्न आय वाले लोग दस रुपए कमा रहे हैं, तो ऊंची आय वाले लोग 120 रुपए। सावधान, यह तुलना गरीबी और अमीरी के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्तियों यानी उद्योगपतियों और दिहाड़ी मजदूरों के बीच नहीं की गई है, बल्कि रिपोर्ट में उच्च आयवर्ग का व्यक्ति उसे माना गया है, जो उच्च मध्यम वर्ग से थोड़ा नीचे, जबकि निम्न मध्यम वर्ग से थोड़ा-सा ऊपर जीवन गुजार रहा है।
मतलब, यह तुलना अव्यावहारिक नहीं है। अव्यावहारिक तब होती, जब अजीम प्रेमजी या इंदिरा नूई या 'एÓ ग्रेड के प्रशासनिक अफसरों की तुलना किसी दिहाड़ी मजदूर से की गई होती। जिनके बीच तुलना की गई है, वे बहुत ऊंचे लोग नहीं हैं, तो भी दोनों की आर्थिक स्थितियों में फासला खतरनाक स्तर तक बढ़ता पाया गया है। यह कहना तो गलत होगा कि इस वर्ग में इतना फासला दुनिया के किसी भी देश में नहीं है, पर हां, भारत जिन देशों के साथ चल रहा है, वे चाहे यूरोपीय देश हों या अमेरिका या फिर चीन, जापान, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका आदि, इन देशों में भारत जितना आर्थिक फासला और कहीं नहीं है। अत: जरूरी है कि पूंजीवाद के वकील आंखें खोलें और इस असमानता को दूर करने के प्रयास करें।


दूसरे ग्रह पर जीवन की कल्पना रोमांचक
नासा के अंतरिक्ष यान केप्लर स्पेस ने ब्रह्मांड में लगभग पृथ्वी जैसा दूसरा ग्रह खोज लिया है। इसके बाद रोमांच का बढऩा स्वाभाविक है।
हम इंसान जब कल्पना करते हैं कि धरती से बाहर भी यानी ब्रह्मांड में किसी दूसरे ग्रह पर भी जीवन हो सकता है, तो कितना रोमांच नहीं होता! इसी रोमांच ने दूसरे ग्रह के लोगों (एलियंस) से जुड़ी हुई तमाम काल्पनिक कहानियों को लोकप्रिय बना दिया है। हॉलीबुड (अमेरिका) में इसी विषय पर स्टार वार्स नामक श्रृंखला की जितनी भी फिल्में अब तक बनी हैं, वे सभी केवल इसी वजह से पूरी दुनिया में देखी गईं, क्योंकि हम जानना चाहते हैं कि धरती से बाहर भी क्या जीवन है? इसका पता लगाने के लिए वैज्ञानिकों ने भी तमाम शोध किए हैं। फिलहाल, अमेरिकी अंतरिक्ष संस्था नासा द्वारा दो वर्ष पहले रवाना किया गया अंतरिक्ष यान केप्लर स्पेस टेलीस्कोप इस दिशा में अब तक की सबसे कारगर पहल है। अनंत-ब्रह्मांड में इसने एक ऐसे ग्रह का पता लगाया है, जिसकी परिस्थितियां पृथ्वी से काफी मिलती-जुलती हैं। यह भी संभव है कि उस ग्रह पर जीवन मौजूद हो।
दरअसल, ब्रह्मांड अनंत है, जिसका कोई ओर-छोर नहीं है। फिर, हमारी धरती में कोई हीरे भी नहीं जड़े हैं कि जीवन सिर्फ यहीं है और ब्रह्मांड में वह और कहीं हो ही नहीं सकता। मतलब, ब्रह्मांड के किसी ग्रह पर कहीं हमारी ही तरह या हम से अलग तरह का जीवन होना पूरी तरह संभव है। मगर, नासा ने लगभग धरती जैसा दूसरा जो ग्रह खोज निकाला है, उसकी जानकारियां हमें रोमांचित तो कर सकती हैं, उससे हमें फायदा कुछ नहीं होना है। इसलिए कि यह गृह हमारी प्यारी धरती से छह सौ प्रकाश वर्ष दूर है। यानी, हम यदि उस ग्रह पर जाएं और वह भी प्रकाश की गति से तो पहुंचने में छह सौ वर्ष लगेंगे, जबकि हम जीवित रहते हैं, ज्यादा से ज्यादा सौ वर्ष। फिर भी, इसका मतलब यह नहीं है कि दूसरे ग्रहों के बारे में जानने की कोशिश की ही न जाए। यह तो होते रहना चाहिए, कम से कम रोमांच बढ़ाने के लिए ही सही।

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