मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

हठधर्मी तो घाटे का ही सौदा साबित होगी




राजेन्द्र चतुर्वेदी

कांग्रेस को चाहिए कि वह देश की भावनाओं का सम्मान करे और कठोर लोकपाल कानून बनाए। हठधर्मी तो घाटे का सौदा साबित होगी।
रविवार को जंतर-मंतर पर जो भी हुआ, उसके बाद उम्मीद थी कि सरकार दबाव में आएगी और लोकपाल कानून के मसौदे में वह कुछ ऐसा जरूर करेगी, जिससे देश की भावनाओं का सम्मान होगा। यह उम्मीद तो अब भी कायम है, क्योंकि जंतर-मंतर पर अन्ना के साथ विपक्ष की मौजूदगी पर कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता अभी कुछ नहीं बोले, मगर छोटे और मझोले नेताओं ने अन्ना के खिलाफ जो मोर्चा खोला है, वह क्या है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी आलाकमान पर हुए हमलों का जवाब यदि कांग्रेस की दूसरी-तीसरी कतार के नेता देने लगें, तो इसके दो ही मतलब होते हैं। एक तो यही कि वे लोग आलाकमान या उनके करीबियों के इशारे पर बोल रहे होते हैं और दूसरा यह कि वे लोग अपनी मर्जी के मुताबिक बोल रहे होते हैं, ताकि आलाकमान की नजरों में उनके अंक बढ़ सकें और सिद्ध हो सके कि वे दूसरों से ज्यादा वफादार हैं। इस मामले में क्या हो रहा है, कौन जाने?
हां, समाजवादी से कांग्रेसी बने और फिलहाल केंद्रीय इस्पात मंत्री के पद पर बैठे बेनी प्रसाद वर्मा का अन्ना को धमकाना और यह कहना कि अन्ना अगर यूपी में आए, तो देख लेंगे? ...जैसे जो भी बयान कांग्रेसी नेताओं की ओर से आए हैं, उन पर यह जरूर कहा जा सकता है कि बयान अगर आलाकमान की नजरों में अंक बढ़वाने के लिए दिए गए हैं, तो कोई बात नहीं, मगर बयान यदि बड़े नेताओं को विश्वास में लेकर दिए गए हैं, तो इसका मतलब यही है कि कांग्रेस लोकपाल पर जन-भावनाओं को समझने के लिए अब भी तैयार नहीं है। बहरहाल, अभी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता कि माजरा कुल मिलाकर है, क्या? निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए हमें इस पर नजर रखनी होगी कि कांग्रेस के बड़े नेता इस मुद्दे पर कब बोलते हैं और क्या-क्या बोलते हैं?
वैसे, समझदारी तो इसी में है कि सरकार देश की मंशा को समझे और भ्रष्टाचार से जूझ रहा देश यही चाहता है कि भ्रष्टों को दंडित करने के लिए एक ताकतवर कानून जल्दी से जल्दी आकार ग्रहण करे। कांग्रेस यदि देश की यह मंशा नहीं समझेगी, तो चूक जाएगी। दरअसल, अन्ना हजारे का अभियान गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति की शुरुआत भी बन सकता है। प्रमुख विपक्षी दलों के नेताओं ने अन्ना के मंच पर पहुंचकर कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। यह सही है कि यदि ऐसा हुआ, तो यह आंदोलन की सेहत के लिए भी ठीक नहीं होगा, पर आंदोलन तो कई खड़े हो जाएंगे। हां, कांग्रेस को जो झटका लगेगा, वह जोर का होगा।

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