सोमवार, 19 दिसंबर 2011

पद के दुरुपयोग का आरोप बेहद संगीन




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

गृह मंत्री पी. चिदंबरम पर पद के दुरुपयोग का आरोप लगा है। यदि आरोप सही है, तो उनके इस्तीफे की विपक्ष की मांग भी गलत नहीं है।
संसद में शुक्रवार को भी हंगामा होता रहा। हंगामे की वजह बने देश के गृह मंत्री पी. चिदंबरम। उल्लेखनीय है कि चिदंबरम को टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले में तो पहले से ही 'लपेटाÓ जा रहा है। इसके लिए सुब्रमण्यम स्वामी ने बाकायदा अदालत का दरवाजा खटखटाया है और फिलहाल उनकी याचिका पर सीबीआई की विशेष अदालत में सुनवाई चल रही है व उसमें स्वामी चिदंबरम के खिलाफ गवाही देने को तैयार बैठे हैं। स्वामी पी. चिदंबरम के खिलाफ इतने पापड़ इसलिए बेल रहे हैं, क्योंकि आरटीआई के जरिए बाहर आए वित्त मंत्रालय के एक पत्र में उल्लेख है कि यदि चिदंबरम चाहते, तो टूजी घोटाला रोका जा सकता था। बहरहाल, इस कहानी का सार-संक्षेप यह है कि इस आरोप के कारण विपक्ष, खासतौर पर भाजपा संसद में चिदंबरम का बहिष्कार कर रही है। इधर, विपक्ष के हाथों में उनके खिलाफ एक और हथियार लग गया है और यह टूजी वाले हथियार से कहीं ज्यादा प्रहारक है।
पी. चिदंबरम पर आरोप है कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया है। यदि इस मामले की गहराई से पड़ताल करें, तो यह तथ्य सामने आता है कि एक व्यापारी पर जालसाजी का संगीन आरोप लगा था। उसका मामला अदालत में गया, तो वहां उसकी पैरवी वकील की हैसियत से पी. चिदंबरम ने की थी, वर्ष-1999 में। फिर, परिस्थितियां बदलीं, तो केंद्र में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी और चिदंबरम को उसमें वित्त मंत्री बनाया गया। 26 नवंबर-2008 को मुंबई में हुए भीषण आतंकवादी हमले के बाद परिस्थितियों ने एक मोड़ और लिया और चिदंबरम को देश के गृह मंत्रालय की कमान सौंपी गई तथा वे तब से अब तक गृह मंत्री के पद पर विराजमान हैं।
आरोप यह है कि गृह मंत्री की हैसियत से चिदंबरम ने अपने मुवक्किल के खिलाफ पंजीकृत मामला वापस लिया। यदि यह आरोप सही है, तो बेशक यह पद का दुरुपयोग ही है। आरोपी को जिस मामले में अदालत से भी राहत न मिली हो और हमारे गृह मंत्री कभी आरोपी के वकील रह चुके हों और बाद में उन्होंने अपने मुवक्किल के खिलाफ पंजीकृत मामला वापस ले लिया हो, तब उनकी भूमिका पर सवाल भी स्वाभाविक हैं और संसद में विपक्ष यही सवाल उठाकर चिदंबरम का इस्तीफा मांग रहा है। क्या विपक्ष की यह मांग गलत है? अब इस मामले में प्रधानमंत्री को स्वयं हस्तक्षेप करना चाहिए और यदि चिदंबरम ने सचमुच पद का दुरुपयोग किया है, तो उनका इस्तीफा भी लेना चाहिए।


क्या संसद के सत्र को बढ़ाएगी सरकार?

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

संसद के शीतकालीन सत्र के सिर्फ अब चार कार्य दिवस ही शेष रह गए हैं। तब सरकार को सत्र के विस्तार पर विचार करना ही चाहिए। क्या सरकार संसद के शीतकालीन सत्र की अवधि बढ़ाएगी? फिलहाल तो इस प्रश्न का जवाब अभी कोई नहीं दे सकता। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि उसे संसद सत्र की अवधि बढ़ा देनी चाहिए। दरअसल, शीतकालीन सत्र 22 नवंबर को प्रारंभ हुआ था और 22 दिसंबर को वह समाप्त होना है। यानी, संसद के पास कुल 21 कार्य दिवस थे। प्रथम नौ दिवस हंगामे की भेंट चढ़ गए थे, फिर इस सप्ताह के दो दिन भी संसद की कार्यवाही नहीं चल सकी। स्थिति यह है कि संसद के पास कुल मिलाकर चार कार्य दिवस ही शेष बचे हैं। इस सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि संसद ने अब तक गुजर चुके कुल कार्य दिवसों में से सिर्फ छह दिन ही काम किया है। मान लो कि शेष बचे चार दिनों में भी संसद की कार्यवाही सुचारू रूप से चलेगी, हालांकि इसके आसार कम ही हैं, तो भी संसद शीतकालीन सत्र में कुल जितने दिन काम करेगी, वह बहुत कम होंगे। तब संसद के वर्तमान सत्र को विस्तार देना निश्चित ही सरकार की साख बढ़ाएगा।
फिर, दिन बचे हैं, कुल चार और काम बचा है, ढेरों। लगभग एक दर्जन विधेयक पेश होने के लिए तैयार हैं और लोकपाल के बारे में अभी पता नहीं है कि वह कब पेश किया जाएगा, जिसको लेकर पूरा देश बेचैन है। अन्ना हजारे तो 27 दिसंबर से अनशन करने और नए साल के पहले दिन यानी एक जनवरी से जेल भरो आंदोलन छेडऩे का ऐलान भी कर चुके हैं। ऐसे में जरूरी यही है कि लोकपाल विधेयक सहित जो भी विधेयक लटके हैं, उन्हें अब लटकाया न जाए। बचे हुए चार दिनों में यदि यह विधेयक पारित होंगे, तो पक्का है कि उन पर वैसी बहस नहीं हो पाएगी, जैसी कि होनी चाहिए, जबकि लोकतंत्र का तकाजा यही है कि कोई भी नया कानून व्यापक बहस के बाद ही अस्तित्व में आना चाहिए। यह तो तभी होगा, जब संसद सत्र को विस्तार दिया जाएगा।

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