शनिवार, 24 दिसंबर 2011

मायावती के नहले पर केंद्र ने जड़ा दहला

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

चूंकि मायावती ने उत्तरप्रदेश के विभाजन का प्रस्ताव हड़बड़ी में पारित कराया था, इसीलिए उनके पास केंद्र के सवालों का जवाब नहीं है। खबरें परस्पर विरोधाभासी आई हैं। केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने सोमवार को बयान दिया था कि मायावती का उत्तरप्रदेश को चार राज्यों में बांटने का प्रस्ताव आठ-नौ सवालों के साथ उन्हें लौटा दिया गया है, तो मायावती ने मंगलवार को पहले तो यही कहा कि केंद्र ने उनका प्रस्ताव लौटाया नहीं और फिर यह कि केंद्र सरकार उत्तरप्रदेश के विभाजन के मसले को जान-बूझकर लटकाना चाहती है, इसीलिए उसने जो पत्र उत्तरप्रदेश सरकार को भेजा, वह लखनऊ पहुंचने से पहले ही मीडिया को जारी कर दिया गया। इस बयान के बाद साफ हो जाता है कि मायावती भले ही कहती रही हों कि केंद्र ने राज्य के विभाजन का उनका प्रस्ताव लौटाया नहीं, पर कुछ ऐसा हुआ तो है, जो मायावती को रास नहीं आया। वरना, वे उत्तरप्रदेश के विभाजन के मसले को लटकाने का आरोप केंद्र पर क्यों लगातीं? दरअसल, वे तो अब तक इसी मुगालते में थीं कि राज्य विभाजन का गाना गाकर उन्होंने पूरे के पूरे विपक्ष को जोरदार राजनीतिक पटखनी दे डाली है।
अब यदि उन्होंने इस मुद्दे पर फिर कुछ बोला है, तो मतलब यही है कि केंद्र ने उनका प्रस्ताव लौटा दिया है। यानी, देर से ही सही, पर केंद्र ने मायावती के राज्य विभाजन के नहले पर आठ-नौ सवालों सहित प्रस्ताव लौटाकर राजनीतिक दहला जड़ दिया है। इसके साथ ही स्थिति यह भी बन गई कि केंद्र का हर सवाल अब मायावती के राज्य विभाजन के प्रस्ताव की पोल खोलेगा कि वह राज्य को सचमुच विभाजित नहीं करना चाहती हैं, बल्कि इसकी आग को भड़काकर वोट की राजनीति ही करना चाहती हैं। यह तो सही है कि उत्तरप्रदेश की समस्याओं का समाधान उसको टुकड़ों में बांटना नहीं है। फिर भी, मायावती यदि विभाजन में ही समाधान देख रही थीं, तो हड़बड़ी में प्रस्ताव पारित करने की जरूरत क्या थी? प्रस्ताव विस्तृत विचार-विमर्श के बाद ही लाया जाना चाहिए था और उसमें नए राज्यों की सीमाओं, नौकरशाही के विभाजन व नए राज्यों की राजधानियों से जुड़े उन सभी सवालों के जवाब तो होने ही चाहिए थे, जो केंद्र सरकार ने उनसे पूछ लिए हैं।
मगर, मायावती ने तो उत्तरप्रदेश के विभाजन का प्रस्ताव एक ही झटके में यूं पारित कराया, जैसे राज्यों का विभाजन कोई बच्चों का खेल हो। लिहाजा, खेल बिगड़ भी गया। जो सवाल केंद्र ने मायावती से पूछे हैं, वे जल्दी ही चुनावी सभाओं के मंचों पर भी गूंजेंगे और जाहिर है कि मायावती के पास उनका कोई जवाब भी नहीं होगा और तब जनता उनकी राजनीति भी समझ जाएगी।

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