शनिवार, 17 दिसंबर 2011

न्यायपालिका रखती है गरीब जनता का ध्यान


- राजेन्द्र चतुर्वेदी


सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वे ऐसे इंतजाम करें, ताकि गरीबों को सर्दीली रातें सड़कों पर न व्यतीत करनी पड़ें।
उच्चतम न्यायालय इसको लेकर चिंतित है कि सर्दी का मौसम प्रारंभ हो गया है, फिर भी अधिकतर राज्य सरकारों ने बेघर लोगों को आसरा मुहैया कराने का कोई बंदोबस्त नहीं किया। अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे ऐसे इंतजाम करें, ताकि किसी गरीब को कड़कड़ाती इस सर्दी में खुले आसमान के नीचे रात न गुजारनी पड़े। अदालत का यह निर्देश कुल मिलाकर हमारे देश की व्यवस्था पर एक कठोर टिप्पणी है। यह बहुत बड़ी विडंबना है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था को न्यायपालिका याद दिला रही है कि सरकार नागरिकों का ख्याल रखे। जो काम जनता के वोटों से चुनी जाने वाली सरकारों को करना चाहिए, उसके लिए यदि न्यायपालिका को निर्देश देने के लिए आगे आना पड़े, तो सरकारों को तो शर्म से पानी-पानी हो जाना चाहिए, पर यह भी तय है कि ऐसा होगा नहीं, क्योंकि हमारी सरकारों या संसदीय राजनीति के पुरोधाओं को अपनी किसी गलती पर शर्म आती ही नहीं।
यदि न्यायपालिका बेघर लोगों को लेकर चिंतित है, तो इसके कारण भी वाजिब हैं। मीडिया में यह खबरें आ चुकी हैं कि देश की राजधानी दिल्ली में ही ऐसे लोगों की तादाद दो-ढाई लाख के आसपास है, जो सर्दी के मौसम की ये बर्फीली रातें सड़कों और फुटपाथों पर गुजारने के लिए अभिशप्त हैं। पूरे देश में कितने लोग आसमान के नीचे रातें गुजार रहे हैं, इसके आंकड़े शायद किसी के भी पास नहीं होंगे, पर ऐसे लोगों की तादाद करोड़ों में ही होगी और यह उस भारत की तस्वीर का दूसरा पहलू है, जिसके जल्दी विकसित होने के दावे किए जा रहे हैं। इससे हम समझ सकते हैं कि भारत अगर विकसित होगा, तो उसका वास्तविक चेहरा कैसा होगा? देश में करोड़ों लोग अभावग्रस्त हैं, सरकारों को इसकी याद न्यायपालिका को दिलानी पड़ेगी। यदि न्यायपालिका भी जनता का ध्यान न रखे, तो क्या होगा? इसकी कल्पना भी डरावनी है।

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