मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

अपराधियों से ज्यादा लगाव आखिर क्यों?

राजेन्द्र चतुर्वेदी

अपने देश में अपराधियों के मानवाधिकारों की पैरवी तो खूब होती है, पर आम नागरिकों या सुरक्षा बलों के अधिकारों की नहीं, तो क्यों?
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मानवाधिकारों की रक्षा की ही जानी चाहिए। व्यक्ति चाहे अपराधी ही क्यों न हो, जीवित रहने का अधिकार उसे भी है, यही मानवाधिकारों का मूल सिद्धांत है। जो अधिकार अपराधियों के प्रति भी संवेदना दिखाने के हिमायती हों, वह आम नागरिकों के सम्मान और जीवन के तो रक्षक होंगे ही, पर कभी-कभी लगता है कि इस देश के पेशेवर मानवाधिकारों के रक्षक सिर्फ अपराधियों के प्रति ही संवेदनशील हैं, नागरिकों के प्रति नहीं। यहां इसके सैकड़ों उदाहरण मिल सकते हैं, जब हमारे मानवाधिकारवादी आम नागरिकों के मानवाधिकारों के हनन पर तो चुप होकर बैठ गए, पर अपराधियों के मानवाधिकारों की पैरवी के वक्त उन्होंने सामान्य मानवता को भी भुला दिया। ताजा मामला अभी हाल ही में मारे गए माओवादी नेता किशनजी का है।
मानवाधिकारवादियों की आपत्ति के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को उसकी मुठभेड़ में मौत संबंधी रिपोर्ट को तलब करना ही पड़ा, जबकि किशनजी की मौत कोई राष्ट्रीय क्षति नहीं है। वह उन माओवादियों का नेता था, जिनके आतंक से देश कई बार थर्रा चुका है। यह आए दिन की बात है, जब माओवादी नागरिकों या सुरक्षा बलों के सीने में गोलियां उतार देते हैं। क्या मरने वाले आम नागरिकों या सुरक्षा बलों को जीवित रहने का अधिकार नहीं होता? पर कभी सुनने को नहीं मिला कि पश्चिम बंगाल से लेकर आंध्र और छत्तीसगढ़ तक जो सामूहिक नरसंहार हुए हैं या दर्जनों की तादाद में सुरक्षा बलों और पुलिस के जवानों की मौत पर मानव अधिकारों के किसी पैरोकार ने संवेदना के दो शब्द भी बोले। जो लोग अपनी जान हथेली पर रखकर समाज की रक्षा कर रहे होते हैं, उनकी हत्या शायद इनके लिए कोई अर्थ ही नहीं रखती।
यह सही है कि सुरक्षा बलों से भी पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर कश्मीर और देश के नक्सल प्रभावित इलाकों में मानवाधिकारों का हनन होता ही होगा, जो कि नहीं होना चाहिए, पर सच यह भी है कि इन इलाकों में अमन-पसंद नागरिक माओवादियों या फिर उग्रवादियों-आतंकवादियों की गोलियों का निशाना बनने से यदि बचे हुए हैं, तो इसकी वजह यही है कि उनकी रक्षा हमारे सुरक्षा बलों के जांबाज अपने सिर पर कफन बांधकर करते हैं। मानव अधिकारों के पैरोकार भी इस तथ्य को समझें कि मानवाधिकार सिर्फ अपराधियों के ही नहीं होते, बल्कि हरेक नागरिक के होते हैं, वह चाहे पुलिस या सुरक्षा बलों के जवान हों या आम नागरिक, पर ये लोग पैरवी केवल अपराधियों की करते हैं, तो क्यों?

सरकार के शिकंजे से मुक्त हो सीबीआई
भंवरी-कांड सीबीआई की कार्य-कुशलता पर सवाल उठाने के लिए पर्याप्त है। यह संस्था अब सरकार के शिकंजे से मुक्त होनी ही चाहिए।
राजस्थान की लापता नर्स भंवरी देवी पहेली बन गई है। वह तीन महीने से लापता है और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई मामले की जांच भी कर रही है, मगर स्थिति यह है कि अब तक यह भी पता नहीं लगा कि भंवरी जिंदा भी है या नहीं। फिलहाल, जिस शहाबुद्दीन को मामले का सूत्रधार मानकर धर लिया गया है, सीबीआई के हाथ उसका एक टेप लगा है, जिसमें वह अपनी पत्नी से बातचीत कर रहा है और सीबीआई का दावा है कि यह टेप मामले को सुलझाने में मदद करेगा। ऐसा ही दावा तब किया गया था, जब एक कार से भंवरी के तथाकथित बाल बरामद हुए थे। यह बात अलग है कि यह दावा खोखला साबित हुआ है। जो भी हो, पर देश के लिए जितना चिंताजनक भंवरी का लापता होना है, उससे कहीं ज्यादा चिंता सीबीआई की कुशलता को लेकर है। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का यह हाल है कि वह अपराधों का भंडाफोड़ कर ही नहीं पाती। भोपाल की बेटी शहला मसूद की हत्या को कितने दिन हो गए हैं और इस प्रकरण की जांच भी देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी कर रही है, मगर नतीजा अब तक तो कुछ नहीं निकला। थोड़ा और पीछे मुड़कर देखें, तो नोएडा की आरुषि की मौत के मामले ने भी हमारी इस जांच एजेंसी की कुशलता की पोल खोलकर रख दी थी।
यह सही है कि अदालत में दाखिल क्लोजर रिपोर्ट में आरुषि के पिता राजेश तलवार की भूमिका पर इतने सवाल उठाए गए थे कि बाद में उसे ही आरोपी बना दिया गया था, मगर इस सच को भी कोई नहीं झुठला सकता कि राजेश के खिलाफ सीबीआई के पास सबूत नहीं थे। तब देश अगर सीबीआई पर भरोसा करे भी, तो कैसे? अत: केंद्र सरकार नींद त्यागे और न केवल सीबीआई को अपने शिकंजे से मुक्त करे, बल्कि उसे कार्य-कुशल भी बनाए, ताकि देश का अपनी व्यवस्था पर इकबाल बना रहे।

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