मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

औद्योगिक विकास दर में गिरावट शुभ नहीं




राजेन्द्र चतुर्वेदी

औद्योगिक विकास दर में गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। जिन गलतियों के कारण यह स्थिति बनी, उन्हें जल्द ही सुधारो।

औद्योगिक उत्पादन की विकास दर के आंकड़े हमारे सामने हैं और कुल मिलाकर उनकी तुलना अक्टूबर-2010 यानी बीते वर्ष की इसी अवधि के आंकड़ों से की जाए, तो कहानी यही है कि हमारा औद्योगिक क्षेत्र विकास के मामले में बुरी तरह से पिछडऩे लगा है। कहां तो अक्टूबर-2010 में हमारा औद्योगिक क्षेत्र 11.3 फीसदी की धमाकेदार वृद्धि करके पूरी दुनिया को चमत्कृत कर रहा था और कहां अब एक वर्ष बाद यानी अक्टूबर-2011 में वह सिमटकर लगभग छह प्रतिशत पर पहुंच गया है। इस प्रकार, बीते वर्ष के मुकाबले उसमें पांच फीसदी से अधिक की गिरावट आ गई है। हमारे सरकारी अर्थशास्त्री दंग हैं कि आखिर इतनी गिरावट आ कैसे गई? मगर, इसमें आश्चर्यचकित होने जैसी कोई बात है ही नहीं। यदि इस पर कोई आश्चर्य व्यक्त करता है, तो वह पाखंड ही कर रहा है। औद्योगिक उत्पादन सूचकांक आईआईपी, जिसे सरल भाषा में औद्योगिक विकास दर कहा जाता है, उसमें उद्योग, खनन, विनिर्माण जैसे क्षेत्र शामिल होते हैं। इन सभी क्षेत्रों पर कर्ज की ब्याज दरों का सीधा असर पड़ता है, जिसको पिछले एक वर्ष में करीब एक दर्जन बार बढ़ाया जा चुका है। उद्योगपतियों के लिए जब कर्ज महंगे हो जाएंगे, तो इसका प्रभाव उनके उत्पादन पर भी पड़ेगा और यह बात हमारे सरकारी अर्थशास्त्री ठीक से जानते भी होंगे, तब औद्योगिक विकास दर में गिरावट पर परेशान होने का नाटक क्यों किया जा रहा है? रही-सही कसर अमेरिका और यूरोप के देशों की आर्थिक सुस्ती ने पूरी कर दी है। इसके कारण हमारे औद्योगिक निर्यातों पर बुरा प्रभाव पड़ा है और यह सरकारी आंकड़े ही बता रहे हैं कि निर्यात अब 1.7 फीसदी ही बचे हैं। ऐसे में सभी तरह की विकास दरों में गिरावट तो आनी ही है। सरकार में मौजूद अर्थशास्त्रियों की जमात संकेत समझे और अर्थव्यवस्था को उबारने के प्रयास अभी से शुरू करे।

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