शनिवार, 24 दिसंबर 2011

लोकपाल पर टकराव की इबारत तैयार

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

लोकपाल पर अन्ना हजारे व सरकार के बीच टकराव सुनिश्चित है। अन्ना के बाद सोनिया गांधी ने भी अब इसके संकेत दे दिए हैं।

लोकपाल विधेयक का लुंज-पुंज मसौदा सामने आने के बाद अन्ना हजारे ने मंगलवार को ही ऐलान कर दिया था कि मजबूत लोकपाल के लिए उनका आंदोलन जारी रहेगा। इधर, बुधवार को सोनिया गांधी ने भी साफ कर दिया कि लोकपाल विधेयक बेहतर है और अन्ना हजारे को चाहिए कि वे उसे मंजूर कर लें। सोनिया ने यह भी कहा कि सरकार लोकपाल पर लडऩे के लिए तैयार है। दोनों पक्षों की ओर से हुए इन दावों का भावार्थ यही है कि समर-भूमि सज रही है और शायद अबकी बार सरकार अन्ना के आगे हथियार भी नहीं डालेगी, क्योंकि सोनिया गांधी ने हुंकार भर दी है। लगता है कि सरकार इस बार दो मोर्चों पर एक साथ काम करेगी। एक तो यही कि मंत्रिमंडल ने लोकपाल के जिस मसौदे को मंजूरी दी है, उसे चालू सत्र में हर हालत में पारित करा लेगी, तो दूसरा यह कि अबकी बार वह अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने के लिए सभी तरह के हथकंडे अपनाएगी, बल प्रयोग सहित?
दरअसल, राजनीतिक पार्टियां केवल चुनाव से डरती हैं और केंद्र ने चुनावी फतह के लिए खाद्य सुरक्षा विधेयक पारित कराने की तैयारी तो कर ही ली। जब इस विधेयक को अंतिम रूप दिया जा रहा था और देश यह जानने के लिए उत्सुक था कि जिस लोकपाल पर पिछले आठ महीने से गहमा-गहमी हो रही है, सरकार ने उसकी जगह खाद्य सुरक्षा विधेयक को प्राथमिकता क्यों दी? तो कई मंत्रियों ने कहा था कि भूख से पहले निपटा जाना चाहिए, भ्रष्टाचार से बाद में, क्योंकि भ्रष्टाचार के मुकाबले भूख ज्यादा बड़ी समस्या है। ऐसा कहने वालों में केंद्रीय कानून मंत्री सलमान खुर्शीद भी थे, जिन्हें सुलझा हुआ व्यक्ति माना जाता है।
यानी, सरकार की रणनीति साफ है कि वह खाद्य सुरक्षा कानून के हथियार से भ्रष्टाचार के मुद्दे की धार कुंद करने को तैयार है। फिर, लोकपाल विधेयक भी वह पारित कराने जा रही है, जो देश को यह बताने के काम आएगा कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ तो रही है। यह सही है कि जो लोकपाल सरकार लाने जा रही है, वह किसी मतलब का नहीं। उसे किसी भव्य सरकारी भवन में किसी कमरे में एक कुर्सी पर बैठा दिया जाएगा। वह इतना कमजोर है कि भ्रष्टाचार से लड़ ही नहीं पाएगा, पर सरकार का मकसद भी भ्रष्टाचार से लडऩे लायक लोकपाल बनाना नहीं है। देश को यह बताना है कि वह भ्रष्टाचार से लड़ तो रही है। कम से कम सरकार तो यही मान रही है कि उसका यह मकसद पूरा हो गया है। तब सोनिया लोकपाल पर अन्ना से लडऩे की गर्जना तो करेंगी ही।


शिक्षा को पटरी पर लाने के प्रयास हों

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

ओईसीडी की रिपोर्ट बताती है कि हमारे देश में शिक्षा बहुत बदहाल है। शिक्षा को पटरी पर लाने के प्रयास अब फौरन शुरू होने चाहिए।

हमारा देश शिक्षा के मामले में न केवल पिछड़ रहा है, बल्कि अपने समकक्ष देशों यानी चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका से भी बहुत पीछे है। भारत की सरकार को हजम न होने वाले इस निष्कर्ष पर पहुंचा है, ऑर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) नामक एक अंतरराष्ट्रीय संगठन, 74 देशों में शिक्षा पर किए गए एक अध्ययन के बाद। ओईसीडी की रिपोर्ट ने शिक्षा के मामले में 74 देशों की अपनी सूची में भारत को 56 वें पायदान पर रखा है। इस सूची में अमेरिका, कनाडा व यूरोप के देश तो हमसे कहीं बहुत ऊपर हैं ही, चीन, जापान, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका भी हमसे बहुत आगे हैं। शिक्षा के मामले में हमारा मुकाबला कुल मिलाकर वियतनाम से है, जो हमसे एक कदम आगे रहकर इस सूची में 55 वें स्थान पर है, तो इधर इंडोनेशिया से भी है, जो हमसे एक कदम नीचे 57 वें स्थान पर है। जाहिर है कि इस सूची में अतिश्योक्ति तो हो सकती है, पर यह सूची पूरी तरह गलत किसी भी सूरत में नहीं हो सकती।
दरअसल, हमें अपनी शिक्षा की दुर्दशा देखने के लिए किसी सूची और किसी सर्वेक्षण की जरूरत ही क्या है? जिस देश के प्राय: सभी राज्यों की उच्च शिक्षा अतिथि विद्वानों या किसी ऐसे ही दूसरे नाम से संबोधित किए जाने वाले अध्यापकों के हवाले हो, जहां की माध्यमिक शिक्षा प्राय: विषय विशेषज्ञों और जहां की प्राथमिक शिक्षा प्राय: संविदा शिक्षकों या शिक्षाकर्मी-शिक्षामित्रों के हवाले हो, वहां की शिक्षा की गुणवत्ता के क्या कहने? दुनिया के श्रेष्ठ विश्वविद्यालयों की सूची में हमारा एक भी नहीं है। यहां तक कि हमारे तकनीकी और प्रबंधन संस्थान भी नहीं, तब किसी सर्वेक्षण को खारिज करने की गुंजाइश कहां बचती है? जरूरत तो अब इस बात की है कि सरकार ओईसीडी की रिपोर्ट के आईने में अपना चेहरा देखे और शिक्षा को पटरी पर लाने के उपाय करे।

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