सोमवार, 19 दिसंबर 2011

सिद्धांतविहीन राजनीति के उदाहरण हैं अजीत



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

चौधरी अजीत सिंह को केंद्रीय मंत्रिमंडल में कुर्सी मिल ही गई। देखना है कि यह सिद्धांत-विहीन गठबंधन यूपी में क्या गुल खिलाता है?

अन्ना-आयुवर्ग के 73 वर्षीय चौधरी अजीत सिंह के केंद्रीय कैबिनेट मंत्री की शपथ लेने के साथ ही हमारी वर्तमान राजनीति में सिद्धांतविहीन गठबंधन का एक और आयाम स्थापित हो गया। कांग्रेसी व कांग्रेस-विरोधी मंत्रिमंडलों में लगातार तीन बार केंद्रीय मंत्री रहे अजीत सिंह चौ. चरण सिंह के चिरंजीव और राजनीतिक वारिस हैं। याद रहे, जिन चौ. चरण सिंह का मोरारजी मंत्रिमंडल के गृह मंत्री के नाते एकसूत्रीय कार्यक्रम इंदिराजी को जेल भेजना था, उन्हीं चरण सिंह ने संजय गांधी के समर्थन से प्रधानमंत्री पद का चातुर्मास पूरा करके लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करने की अपनी तमन्ना पूरी की थी। यदि राजनीति संभावनाओं का ही खेल है, तो अजीत सिंह को केंद्र और अपने गृह राज्य उत्तरप्रदेश, दोनों में संभावनाएं दिख रही हैं। संसद में उनके कुल पांच सदस्य हैं, जिनके कारण कांग्रेस को केंद्र में मजबूती मिलेगी।
पश्चिमी उत्तरप्रदेश में वे एक कद्दावर जाट नेता माने जाते हैं और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) के उत्तरप्रदेश की विधानसभा में दस विधायक हैं। क्या उत्तरप्रदेश में कांग्रेस और आरएलडी के साथ मिलने से वहां के विधानसभा चुनावों में दोनों को लाभ होगा? क्या अजीत सिंह उत्तरप्रदेश में संजीवनी तलाशती मरियल कांग्रेस की मजबूती का कारण बनेंगे? क्या अजीत सिंह को कुर्सी पर बैठाना कांग्रेस की मजबूरी थी? क्या कांग्रेस और आरएलडी का यह फौरी गठबंधन मजबूरियों का मिलन है? यदि उत्तरप्रदेश का विभाजन हो जाता है, जिसकी फिलहाल तो कहीं कोई संभावना नहीं, तो अजीत सिंह की महत्वाकांक्षा उत्तरप्रदेश के प्रस्तावित हरितप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की ही होगी।
खैर, केंद्रीय कैबिनेट में उन्हें उनका पसंदीदा जमीन से जुड़ा कृषि मंत्री का पद नहीं मिला, बल्कि हवा में उडऩे वाला नागरिक उड्डयन मंत्रालय मिला है। राजनीति का 'अजीत-तत्वÓ भारत की पूरी राजनीतिक बिरादरी से जवाब तलब करता है। हमारे सभी दल दरअसल राजनीति के शुद्धिकरण के पैरोकार बनकर दलबदल का विरोध करते रहते हैं, लेकिन सभी ने व्यवहारत: दलबदलुओं के सहारे भी सत्ता प्राप्त की है। कांग्रेस तो इसकी जनक है, मगर दूध का धुला भी कोई नहीं। वर्तमान में उत्तरप्रदेश चुनाव के संदर्भ में कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन साफ बता रहा है कि हमारे राजनीतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए बारंबार सिद्धांतहीन गठबंधन कर सकते हैं। अब देखना यह है कि सत्ता की यह मजबूरी किसे मजबूत करती है और इससे प्रजातंत्र अंतत: कितना कमजोर होता है?


धर्म ग्रंथों के दायरे को सीमित करना गलत

गीता, कुरान या बाइबल किसी धर्म-विशेष के ग्रंथ नहीं हैं, ये तो मानव-जाति की बहुमूल्य थाती हैं। तब रूस में गीता पर प्रतिबंध क्यों?

जिस समय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह रूस की मैत्री-यात्रा पर थे, उसी समय यह चौंका देने वाली खबर आ गई कि वहां की सरकार गीता पर प्रतिबंध लगाने वाली है। बताते हैं कि इस्कान के संस्थापक स्वामी प्रभुपाद द्वारा 'भगवत गीता एज इट इजÓ शीर्षक से जो व्याख्यात्मक पुस्तक लिखी गई है, उसे लेकर साइबेरिया की एक अदालत में मुकदमा चल रहा है, जिसका फैसला आने ही वाला है। आरोप है कि गीता से सामाजिक अशांति फैल सकती है, जो 'शांति के लिए प्रतिबद्धÓ एक धर्म विशेष के उसूलों के विरुद्ध है। शायद गीता के '...युद्धाय कृत निश्चयÓ जैसे आह्वान संकीर्ण सोच वालों को जंगजू या कट्टरपंथी लगे होंगे। सोवियत संघ के विघटन से पहले वहां के कम्युनिस्टों ने भगवान को देश निकाला दे दिया था। नब्बे साल तक वहां धार्मिक ग्रंथ प्रतिबंधित थे, लेकिन वहां के पांच इस्लामी गणराज्यों में, जो कि अब पृथक राष्ट्र बन चुके हैं, जब भी कोई भारतीय मुस्लिम जाता था, तब वहां के लोग उससे किसी भी कीमत पर कुरान मांगते थे।
गीता, कुरान और बाइबल किसी धर्म विशेष के ग्रंथ नहीं हैं। ये तो विश्व मानवता की थाती हैं। योगेश्वर कृष्ण ने महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र में फलरहित कर्तव्य-परायणता का शांति संदेश दिया था। गीता को मात्र हिंदुओं का ग्रंथ समझना भ्रामक है। द्वितीय विश्व युद्ध (1939-45) ईसाई राष्ट्रों के बीच ही हुआ था और तब ब्रिटिश जनरल मोंट गोमरी ने गीता का हवाला देकर क्रिसमस के दिन युद्ध बंद करने का आह्वान किया था। उन्होंने यही कहा था कि जब तक योगिराज कृष्ण गीता का उपदेश देते रहे, कुरुक्षेत्र शांत रहा...। बहरहाल, वर्तमान में इस अशांत विश्व में शांति की बहुत जरूरत है। गीता ही इस दुखी संसार में सुखी समाज की स्थापना कर सकती है। आशा है कि रूस में भी धार्मिक-सहिष्णुता और सद्बुद्धि का अभाव नहीं रहेगा।

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