मंगलवार, 3 जनवरी 2012

अदालत की चिंता को समझा जाना चाहिए

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

दिल्ली की एक अदालत ने सोशल नेटवर्किंग साइटों को निर्देश दिया है कि वे आपत्तिजनक सामग्री को छह फरवरी-2012 तक हटा लें। दिल्ली की एक अदालत ने एक व्यक्ति की शिकायत पर 21 सोशल नेटवर्किंग साइटों को समन जारी करने के बाद अब यह भी कह दिया है कि ये सभी साइटें छह फरवरी-2012 तक सभी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री हटा लें।


अदालत के इस निर्देश के बाद संभव है कि सोशल साइटों के प्रतिनिधि ऊंची अदालतों का दरवाजा खटखटाएं और संभव यह भी है कि वे आपत्तिजनक सामग्री बिना नानुकुर के हटा ही लें। यानी, नहीं कहा जा सकता कि इस मामले में आगे क्या होगा या क्या नहीं, मगर अदालत ने अगर निर्देश दिया है, तो इन साइटों पर जरूर कुछ न कुछ ऐसा होगा भी, जो नहीं होना चाहिए। खास बात यह है कि अदालत का निर्देश वैसा नहीं है, जैसा केंद्रीय दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने दिया था। सिब्बल सोशल नेटवर्किंग साइटों से इसलिए नाराज थे और शायद अब भी हैं कि लोग उन पर कांग्रेस के विरोध में मोर्चा खोलकर बैठ गए हैं। यह बात अलग है कि मामले ने जब तूल पकड़ा, तो सिब्बल कांग्रेस की जगह सभी पार्टियों के नेताओं के विरुद्ध इन साइटों पर सामग्री होने की बात करने लगे थे।
जब बात इससे भी नहीं बनती दिखी, तब सिब्बल ने नया पैंतरा यह मारा था कि सोशल नेटवर्किंग साइटों पर विभिन्न धर्मों के देवी-देवताओं, प्रतीकों, धर्म-ग्रंथों का अपमान हो रहा है। यह बात अलग है कि सिब्बल को समर्थन इसके बाद भी नहीं मिला था और तब वे चुप्पी साधकर बैठ गए थे। अदालत का निर्देश सिब्बल के इस उत्पात से अलग है। उसने साफ किया है कि इन साइटों पर जीसस, पैगंबर, महात्मा बुद्ध समेत हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के खिलाफ भी आपत्तिजनक सामग्री मौजूद है। इसके अलावा, इन साइटों पर अश्लील सामग्री भी मौजूद है और यह सामग्री चूंकि सार्वजनिक है, इसलिए 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को भी वह मिल ही जाती होगी। लिहाजा, न्यायमूर्ति सुदेश कुमार ने कहा कि यह सब 'प्रथमदृष्टयाÓ गलत लगता है।
न्यायमूर्ति ने 'प्रथमदृष्टयाÓ शब्द का प्रयोग किया है व इसका मतलब यही है कि यदि सोशल नेटवर्किंग साइटों के प्रतिनिधि कोर्ट में अपना पक्ष ठीक से रखें, तो आपत्तिजनक सामग्री हटाने का अदालत का निर्देश कोई पत्थर की लकीर नहीं है, वह बदल भी सकता है। अदालत ने जो कहा, उसकी सराहना होनी चाहिए। अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि वे नहीं चाहते कि उनकी बेटियां ये साइटें देखें। तब इन साइटों को लेकर हम अपनी अदालत की चिंता को कैसे खारिज कर दें?

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