सोमवार, 23 जनवरी 2012

दावोस सम्मेलन से कुछ उम्मीद तो है




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

दावोस में 25 जनवरी से प्रारंभ होने वाले विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजरें हैं, क्योंकि उसकी सेहत दुरुस्त नहीं है।
दुनिया की नजर
25 जनवरी से स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाले उस आर्थिक सम्मेलन पर है, जो शुरू होने से पहले ही चर्चाओं में आ गया है। विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) नाम के जिस संगठन के बैनर तले यह सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है, दरअसल चर्चाओं को जन्म भी उसी संगठन के संस्थापक ने दिया है। इस संगठन के संस्थापक-अध्यक्ष क्लाउस मार्टिन स्चवॉब ने बहुत ही साफगोई से कहा है कि दुनिया ने पूंजीवाद के जिस रूप को अपनाया है, वह उपयुक्त नहीं है। जाहिर है कि जब पूंजीवाद का कोई समर्थक ही उस पर सवाल उठाए, तो दुनिया की जिज्ञासा भी बढ़ेगी ही। उत्सुकता बढऩे का दूसरा कारण यह है कि अभी हाल ही में विश्व बैंक वैश्विक आर्थिक मंदी के गहराने की शंका व्यक्त कर चुका है, तो अन्य वैश्विक आर्थिक संस्थाएं भी मान रही हैं कि 2012 में मंदी का संकट और गहरा सकता है।
उधर, अमेरिकी अर्थव्यवस्था जरूर संकट से उबरती लग रही है, तो भारत, जापान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील, रूस को मंदी के संकट से बाहर मान लिया गया है, पर यूरोप का संकट जस का तस बरकरार है, तो उस चीन में भी मंदी दस्तक दे चुकी है, जिसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत माना जाता था। डब्ल्यूईएफ की बैठक पर इसीलिए दुनिया का ध्यान और ज्यादा है कि यूरोप को मंदी से बाहर निकालने के लिए यह संगठन क्या सुझाव देता है? यदि यह सम्मेलन भी इस विचार के आसपास केंद्रित रहा कि पूंजीवाद का मौजूदा स्वरूप दुनिया के लिए उपयुक्त नहीं है, तब पूंजीवाद के समर्थकों और विरोधियों के बीच एक नई बहस छिड़ जाएगी। इसमें कोई शक नहीं कि पूंजीवाद उसी तरह विफल हो गया है, जिस प्रकार माक्र्सवाद, पर पूंजीवाद के समर्थक अभी इस सच को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं दिख रहे हैं।
खैर, वैश्विक अर्थव्यवस्था को जो विचार मजबूती दे सकता है, वह है, गांधीवादी समाजवाद। यह सही है कि डब्ल्यूईएफ की बैठक में गांधीवादी समाजवाद पर विचार नहीं होगा, क्योंकि पहले पूंजीवादी मानें तो कि वे विफल हो गए हैं, मगर हां, मानना यह भी होगा कि क्लाउस मार्टिन स्चवॉब ने ठहरे हुए पानी में एक कंकड़ तो उछाला ही है। दुनिया में पूंजीवाद के विरोध में यदि एक लहर भी उठती है, तो संभावना है कि आगे चलकर वह ज्वार में बदल सकती है, क्योंकि पूंजीवादी नीतियों के कारण दुनिया की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा फिलहाल दुखी ही है। डब्ल्यूईएफ यदि इस बात को समझ रहा है, तो वह एक उपलब्धि ही है।

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