बुधवार, 18 जनवरी 2012

कमजोर होने लगी हैं लोकतंत्र की जड़ें!


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

उत्तरप्रदेश और पंजाब में नोटों की बरामदगी से पता चलता है कि चुनावों में धनबल का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसको तो रोकना ही पड़ेगा।


पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का आगाज हो चुका है तथा उत्तरप्रदेश और पंजाब में जिस प्रकार नोटों के बंडल बरामद हो रहे हैं और चुनाव आयोग जिस प्रकार इस गोरखधंधे पर लगाम कसने में असमर्थता जता रहा है, उससे साफ होता जा रहा है कि ये चुनाव धनबल के सहारे ही लड़े जा रहे हैं। संसदीय लोकतंत्र में देश को चलाने का जिम्मा संसद और विधानसभाओं पर होता है, पर जो विधायक नोटों के भरोसे जीतकर आएंगे, वे अपने क्षेत्र के मतदाताओं की समस्याओं को सुलझाएंगे या येन-केन-प्रकारेण नोट कमाएंगे, इस सवाल पर विचार करने का समय आ गया है, साथ ही विचार इस पर भी करना होगा कि चुनावों को भ्रष्टाचार से मुक्त कैसे कराया जाए? सच वही है, जो अन्ना हजारे कहते हैं कि राजनीति पैसे का खेल हो गई है। पैसा खर्च करके चुनाव में उतरो और फिर जीतकर जितना हो सके, उतना कमाओ।
कुछ राजनीतिज्ञ इसका अपवाद हो सकते हैं, पर राजनीति का अघोषित नियम यही बन गया है कि वहां पैसा ही बोलता है। तब क्या किया जाए, इस चुनावी भ्रष्टाचार को रोकने के लिए? इसकी जडें़ काले धन की अर्थव्यवस्था में निहित हैं। कौन नहीं जानता कि भारत में सफेद के समानांतर ही काले धन की अर्थव्यवस्था भी चल रही है। नेता लोग खुद मानते रहे हैं कि दिल्ली से जो एक रुपया नीचे भेजा जाता है, उसमें से दस-पंद्रह पैसे ही लाभार्थियों तक पहुंचते हैं। यानी, विकास के नाम पर राजकोष का और दूसरे देशों से कर्ज लेकर जो धन पानी की तरह देश में बहाया जा रहा है, उसका 80-85 फीसदी हिस्सा भ्रष्टाचारी डकार लेते हैं और यही वह पैसा है, जो काला धन बन जाता है और इसी का एक हिस्सा नेताओं-पार्टियों के लिए चंदे के रूप में मिलता है।
तब समस्या का स्थाई समाधान तो यह है कि भ्रष्टाचार और काले धन पर पूरी तरह रोक लगाई जाए, लेकिन जब तक यह नहीं हो पाता, राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चुनावी चंदे को तो पारदर्शी बना ही दिया जाना चाहिए। चुनाव आयोग ने हाल ही में इस संदर्भ में जो सुझाव दिए थे, उनमें एक सुझाव तो यह दिया गया था कि चुनावी चंदा केवल चैक से लिया जाए, तो दूसरा यह कि राजनीतिक पार्टियों की आय के हिसाब-किताब की जांच होनी चाहिए। इन सुझावों पर अमल के बाद चुनाव में नोटों के बंडलों के चलन पर अंकुश लगता, पर चुनाव आयोग के सुझाव मानता भी कौन है? दरअसल, प्राय: सभी राजनीतिक दल एक जैसे हैं, इसलिए चुनावों में धनबल का चलन बढ़ता जा रहा है।

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