मंगलवार, 10 जनवरी 2012

आंकड़े भी कभी-कभी झूठ बोलने लगते हैं


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

खाद्य मुद्रास्फीति की दर नकारात्मक हो गई है, तो भी इस गिरावट का बाजार पर कोई असर नहीं है। यानी, यह आंकड़ा झूठ बोल रहा है।

कहा तो यही जाता है कि आंकड़े झूठ नहीं बोलते, मगर खाद्य मुद्रास्फीति की वह दर, जो गिरकर नकारात्मक हो गई है, क्या उस पर भी यही बात लागू होती है? उल्लेखनीय है कि 24 दिसंबर को खत्म हुए सप्ताह की जो खाद्य मुद्रास्फीति की दर निकलकर आई है, वह नकारात्मक (-3.36) पाई गई है। यदि यह दर सही है, तब तो महंगाई ज्वार से भाटे में तब्दील हो जानी चाहिए थी, पर बाजार का सच तो इस आंकड़े को मुंह ही चिढ़ा रहा है। सच सिर्फ इतना -सा है कि आवक बढऩे से थोक वाले बाजार में सब्जियों के दाम कम हो गए हैं। इतने कम कि किसानों का लागत मूल्य भी बाजार से वसूल नहीं हो रहा है। अलबत्ता, खाने-पीने की अन्य वस्तुओं के दाम तो बढ़ ही रहे हैं। कुछ वस्तुओं, मसलन-गेहूं के दाम स्थिर हैं। मगर, वे जहां पहुंचकर स्थिर हुए हैं, वह दाम भी कम नहीं। यह भी पिछले वर्ष की बंपर पैदावार का नतीजा है, न कि सरकार द्वारा महंगाई रोकने के नाम पर किए गए तमाम चोचलों का।
हां, इस दर पर कुछ असर इसका जरूर पड़ा होगा कि भारतीय रिजर्व बैंक ने नीतिगत ब्याज दरों यानी रेपो और रिवर्स रेपो की दर में फिलहाल कोई इजाफा नहीं किया है। दरअसल, आरबीआई को पता चल गया है कि बीते वर्ष की सख्त मौद्रिक नीति महंगाई को काबू में नहीं कर पाई थी। उल्टा असर यह जरूर हुआ था कि देश के औद्योगिक उत्पादन में गिरावट आ गई है। बीते वर्ष की मौद्रिक नीति ने उद्योग, व्यापार, विनिर्माण व उत्खनन क्षेत्र को इतना तगड़ा झटका दिया है कि इस वर्ष यदि नीतिगत दरों में बजट से पहले ही कटौती नहीं की गई, तो ये क्षेत्र इस वर्ष भी पिछले झटके से उबर नहीं पाएंगे। इस दर में गिरावट का एक और कारण चुनावी है।
31 दिसंबर की रात जब देश पुराने वर्ष की विदाई और नए का स्वागत कर रहा था, तब तेल कंपनियां पेट्रोल के दाम बढ़ाने के लिए माथापच्ची कर रही थीं। अत: 31 दिसंबर-2011 से दो जनवरी-2012 तक यही लगता रहा कि पेट्रोल के दाम अब बढ़े कि तब बढ़े। पर, पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हैं, लिहाजा उन्हें इसकी अनुमति नहीं मिली। यदि चुनाव नहीं होते, तो पेट्रोल के दाम बढ़ा दिए जाते व तेल कंपनियों के घाटे का रोना रो दिया जाता और तब खाद्य महंगाई की दर भी कुछ और ही होती। यानी, दर में जो गिरावट आई है, उसकी कोई ठोस वजह नहीं है, तभी बाजार पर भी उसका कोई असर नहीं दिख रहा है, इसीलिए केंद्र सरकार दर में गिरावट का जश्न न मनाए, बल्कि महंगाई रोकने के उपाय करे, क्योंकि महंगाई दर का यह आंकड़ा झूठ बोल रहा है।

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