बुधवार, 18 जनवरी 2012

भारत ने जीत ही ली है पोलियो से लड़ाई




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

बीते एक वर्ष में देश में पोलियो का एक भी मामला सामने नहीं आया है। यानी, हमारा देश पोलियो से अपनी लड़ाई अंतत: जीत चुका है।

भारत पोलियो से जंग जीत गया है। अभिशाप समझी जाने वाली इस बीमारी का अंतिम मामला पिछले वर्ष 13 जनवरी को पश्चिम बंगाल में सामने आया था। उसके बाद अब तक एक भी मामला सामने नहीं आया है। यानी, करीब तीन दशक तक बिना थके पोलियो से लड़ते रहने का नतीजा यही है कि अब धरती पर पहला कदम रखने वाले बच्चों को 'दो बूंद जिंदगी कीÓ पिलाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हां, यह बात अलग है कि पिछली सदी में देश के जिन बच्चों के भविष्य को पोलियो बर्बाद कर चुका है, उनके अंधेरे जीवन में रोशनी भरने की फिलहाल कोई तरकीब हमारे पास नहीं है। उनका तो मनोबल ही बढ़ाया जा सकता है व जीवन की दौड़ में उनका सहभागी बना जा सकता है।
बहरहाल, पोलियोमिलिटीज यानी पोलियो विषाणु के माध्यम से होने वाली एक ऐसी संक्रामक बीमारी है, जिसमें मानव शरीर के जो भी अंग (ज्यादातर हाथ-पैर) प्रभावित होते हैं, उन्हें लकवा मार जाता है। प्रदूषित पानी और भोजन के जरिए ये विषाणु पेट में चले जाते हैं और फिर स्नायुतंत्र पर हमला करते हैं। पांच वर्ष तक की उम्र में इसके संक्रमण की आशंका सबसे ज्यादा होती है। यह भी एक मुश्किल ही है कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, तो यह भी कि प्रारंभिक अवस्था में इस रोग की पहचान भी असंभव है। जब बच्चे इसकी चपेट में आ जाते हैं, तब ही पता चलता है कि उन्हें पोलियो हो गया है। यानी, इससे बचने का एकमात्र ढंग बचाव ही है। तब हम चिकित्सा जगत की चुनौतियों को समझ सकते हैं और यह भी कि जिन चिकित्सकों ने वर्ष-1950 में इस बीमारी की वैक्सीन तैयार की, उन्होंने कितनी मेहनत की होगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पोलियो मुक्त दुनिया का सपना 1988 में देखा था। दुनिया के कई देश अब भी इस अभियान में लगे हुए हैं, पर सुकून का विषय है कि भारत ने लड़ाई जीत ली है।

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