सोमवार, 23 जनवरी 2012

कड़ाके की ठंड ढा रही है भीषण सितम




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

चूंकि प्रकृति के सामने इंसान कहीं नहीं ठहरता। अत: नहीं कहा जा सकता है कि सर्दी कब तक पड़ेगी, पर अभी तो कड़ाके की ठंड पड़ रही है।

इस समय पूरा देश शीतलहर की चपेट में है। आमतौर पर दक्षिण भारत कड़ाके की सर्दी से बचा रहता है, पर इस वर्ष स्थिति इससे अलग है। रविवार को चेन्नई का न्यूनतम तापमान 16 डिग्री था, तो तिरुअनंतपुर का 17.3 डिग्री। जब दक्षिण भारत व समुद्र के नजदीकी शहरों की स्थिति यह है, तो मैदानी और पर्वतीय भागों की सर्दी का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। शनिवार को कश्मीर के पुलवामा का तापमान नकारात्मक होकर -17, तो सियाचिन का -28 डिग्री हो गया था, जिसमें रविवार को और भी गिरावट दर्ज की गई है। इसके बावजूद यह हमारी सेना का शौर्य ही है कि उसने जम्मू श्रीनगर राष्ट्रीय राजमार्ग को आंशिक रूप से ही सही, पर शुरू करा दिया है, जिससे कश्मीरियों के लिए जरूरी सामान की आपूर्ति अभी बहुत ज्यादा नहीं गड़बड़ाई है।
अलबत्ता, मणिपुर की स्थिति ज्यादा खराब है। यदि वहां से आ रही खबरों की ओर ध्यान दें, तो इंफाल में दूध के दाम 80 रुपए प्रतिलीटर के भाव को पार कर गए हैं, जबकि घरेलू गैस का एक सिलेंडर 12 सौ रुपए तक में बिक रहा है, क्योंकि मुनाफाखोर इस स्थिति का अपनी आदत के मुताबिक फायदा उठा रहे हैं। नगालैंड की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। मौसम के जानकारों का कथन यह है कि इस वर्ष सर्दी का मौसम कुछ लंबा खिंचेगा। शुक्रवार को उन्होंने कहा था कि मार्च के पहले सप्ताह तक सर्दी का मौसम चलेगा, तो रविवार को उन्हें लगा है कि यह मार्च के दूसरे सप्ताह तक ख्ंिाच सकता है। रही बात कड़ाके की सर्दी की, तो पछुआ हवाएं अब भी चल रही हैं, तो हमें मानकर चलना चाहिए कि दिन के तापमान में चाहे भले ही वृद्धि हो जाए, मगर कड़ाके की सर्दी अभी एक हफ्ते तक और पड़ती रहेगी। फिर, इसके संबंध में दावे के साथ कुछ कहा भी नहीं जा सकता, क्योंकि प्रकृति के आगे हम सब बहुत बौने हैं। तब हो यह सकता है कि कड़ाके की सर्दी अभी एक-दो दिन में विदा हो जाए या और भी तेज पडऩे लगे।
फिलहाल सर्दी पड़ रही है और स्थिति यह है कि इसको बाढ़ और भूकंप की तरह प्राकृतिक आपदा घोषित करने की मांग तक होने लगी है। इस मौसम में शामत आई है, अभावग्रस्त लोगों, वयो -वृद्ध नागरिकों और स्कूली बच्चों की। पहाड़ी इलाकों में जन-जीवन भी अस्त-व्यस्त है। यह संकट ऐसा है, जिसे टाला नहीं जा सकता। हां, समाज और सरकारों के प्रयासों से उसे कम जरूर किया जा सकता है। कम से कम अभावग्रस्त लोगों की मदद तो की ही जा सकती है, तो बच्चों को भी बचाया जा सकता है।

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