मंगलवार, 10 जनवरी 2012

मीडिया को आत्म-मंथन करना होगा

मीडिया पर सरकारी या किसी स्वायत्त संस्था की निगरानी हो या फिर समूचा मीडिया खुद पहल कर अपने लिए ऐसा स्वनियामक तंत्र बनाए, जिससे उसके मामलों और खबरों में सुधार हो, देश में चल रही इस बहस के बीच प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने मीडिया को आश्वस्त किया है कि सरकार उसकी स्वतंत्रता पर कोई अंकुश नहीं लगाने जा रही है। अलबत्ता, मीडिया से उन्होंने यह अपेक्षा जरूर की कि वह बाहरी दबाव से मुक्त होकर स्वयं अनुशासित रहे। यानी, मीडिया को अपने अंदर की गड़बडिय़ों को खुद ही दुरुस्त करना होगा। यह सही भी है। मीडिया के इस कदम से जहां उसके समाचारों की विश्वसनीयता बढ़ेगी, तो वहीं प्रेस की आजादी से संबंधित दीगर चुनौतियां भी कमी होंगी।
प्रधानमंत्री ने हाल ही में यह बात एक समाचार पत्र के आयोजन में शिरकत करते हुए कही। उन्होंने मीडिया में स्वयं अनुशासन की बात ऐसे समय कही है, जब मीडिया की नियामक संस्था भारतीय प्रेस परिषद उससे निपटने के लिए सरकार से सख्त अधिकार मांग रही है। जाहिर है कि प्रधानमंत्री के इस बयान का स्वागत किया जाना चाहिए कि वे लोकतंत्र में स्वतंत्र मीडिया का होना जरूरी समझते हैं, पर इन सद्इच्छाओं के बावजूद मीडिया से भी कुछ अपेक्षाएं हैं। पत्रकारिता की भी कुछ मर्यादाएं होती हैं। जो इस कारोबार में हैं, उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि इन मर्यादाओं का पालन हो। प्रेस की आजादी का मतलब यह कतई नहीं कि पत्रकारिता की सारी मर्यादाएं ताक पर रख दी जाएं। बीते कुछ सालों में देश में जिस तरह से पैसे लेकर खबर छापने के मामले सामने आए हैं, उससे निश्चित रूप से मीडिया की साख को धक्का लगा है। मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ तभी तक है, जब तक वह जनता की आवाज है। यदि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ किसी से पैसे लेकर जनता को गुमराह करता है, तो वह न केवल अपने पाठक-दर्शक को धोखा देता है, बल्कि अपने पेशे को भी दागदार करता है। बीते एक दशक में जिस तरह मीडिया, खासतौर पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कार्यक्रमों के स्तर में गिरावट आई है, समाज में यह आवाज उठने लगी है कि अब इस पर नियंत्रण बहुत जरूरी है।
न्यूज चैनलों के लिए भी कोई ठोस आचार संहिता होनी चाहिए। यह मांग उस वक्त और भी ज्यादा वाजिब लगती है, जब खुद को सच का पहरेदार बताने वाले न्यूज चैनल फिल्मी सितारों, फैशन परेड और क्रिकेट को इस तरह से पेश करते हैं, जैसे कि जनता की असल समस्या यही हों। इतना ही नहीं, समाचार चैनल अपने प्राइम टाइम में भूत-प्रेत, ज्योतिष, अंधविश्वास, कर्मकांड, कॉमेडी सर्कस और अश्लील दृश्य-नृत्य दिखाते रहते हैं। अब तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी पेड न्यूज का चलन बढ़ गया है। प्रिंट मीडिया में तो पाठक को फिर भी पता चल जाता है कि खबर पेड है या नहीं, लेकिन न्यूज चैनलों में तो यह पता ही नहीं चलता कि दिखाया जा रहा कार्यक्रम खबर है या पेड न्यूज। अभी ज्यादा दिन नहीं बीते, जब गोवा के एक न्यूज चैनल ने एक स्टिंग ऑपरेशन में स्वीकार किया कि उसने पैसे लेकर एक नेता का इंटरव्यू दिखाया था। चुनावों के समय पेड न्यूज के ऐसे मामले खूब सामने आते हैं।
यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने मीडिया का ध्यान पेड न्यूज की तरफ दिलाते हुए उससे खुद इस पर काबू पाने की इच्छा जताई। कुल मिलाकर, प्रधानमंत्री ने मीडिया को फिर उसकी वह भूमिका याद दिलाई है, जिसके लिए उसका गठन हुआ। उसे उन मुद्दों की ओर ज्यादा ध्यान देना चाहिए, जो देश की जनता से सरोकार रखते हैं। मीडिया को हमेशा जनहित में काम करना चाहिए। उसका काम जनता में जागरूकता और सूचना का प्रसार करना है, न कि उन्हें पिछड़ा और दकियानूसी बनाना। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां शिक्षा का स्तर व सामाजिक संरचना में विषमता है और एक बड़ी आबादी सूचना तथा ज्ञान के लिए मीडिया पर निर्भर है, इस बात को और ज्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। अब वक्त आ गया है कि लोकतंत्र का यह चौथा खंभा आत्म-मंथन करे कि कहां उसके काम में कमी आ गई? कौन-सी वजहे हैं, जिनके चलते उस पर सवाल उठने लगे? मीडिया जितनी जल्दी इन सवालों के जवाब ढूंढ लेगा, वह न केवल उसके, बल्कि देश के भी हित में होगा।

- जाहिद खान

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