मंगलवार, 10 जनवरी 2012

विज्ञान में हमसे बहुत आगे हो गया चीन


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री ने माना है कि भारत वैज्ञानिक शोधों के मामले में चीन से पिछड़ गया है। हम सिर्फ पिछड़े नहीं, बल्कि चीन के आगे कुछ नहीं हैं।


विज्ञान आधुनिक सभ्यता की आधारशिला है। जो देश विज्ञान को जितनी तरजीह देता है, वह उतनी ही तरक्की करता है। कम से कम 17वीं सदी की औद्योगिक क्रांति के बाद तो विज्ञान और विकास के बीच सीधा रिश्ता बन गया है। मगर, हमारा देश यह रिश्ता अब तक नहीं बना पाया है। कहा तो यही जाता है कि भारत 21वीं सदी में दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल हो गया है, पर इस दावे के पक्ष में जो तर्क दिए जाते हैं, वे आर्थिक होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमें आर्थिक विकास दर के आंकड़े दिखा-दिखा कर समझाया जाता है कि भारत विकसित हो रहा है। विज्ञान की बात कोई नहीं करता। हम इस सच को भूलने अथवा भुलाने की चेष्टा करते हैं कि वैज्ञानिक शोधों के क्षेत्र में भारत निरंतर पिछड़ता जा रहा है। हां, मंगलवार को हमारे प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने जरूर माना कि वैज्ञानिक शोधों के मामले में हम चीन से भी पीछे हो गए हैं। उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर में विज्ञान कांग्रेस के उद्घाटन के बाद उन्होंने कहा कि हम चीन से पीछे हैं।
फिर, यह भी बताया कि वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा कैसे मिल सकता है? यह तो हम जानते ही हैं कि हमारे प्रधानमंत्री सभी मर्जों की केवल एक दवा जानते हैं और उस चमत्कारी दवा का नाम है, निजीकरण। अत: उन्होंने पूंजीपतियों से अनुरोध भी किया कि वे वैज्ञानिक शोधों को बढ़ावा देने के लिए आगे आएं। अमेरिका तो वैज्ञानिक शोधों पर अपनी जीडीपी का 18 फीसदी खर्च करता है। पिछले दस-बारह वर्ष से चीन भी अपनी जीडीपी का 11 फीसदी हिस्सा विज्ञान पर खर्च कर रहा है। एक हम हैं, जो कि अपनी जीडीपी का .09 फीसदी यानी एक फीसदी का भी दसवां हिस्सा खर्च करते हैं। तब विज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ेंगे नहीं, तो और होगा क्या? इस दयनीय स्थिति के कारण ही हमारी वैज्ञानिक प्रतिभाएं अमेरिका और यूरोप की ओर पलायन करने लगी हैं।
यानी, प्रतिभा हमारी और लाभ ले रहे हैं, दूसरे देश। ऐसे में उस चीन से मुकाबला कैसे होगा, जो अपने सूखाग्रस्त इलाकों में बर्फवारी करा लेता है। जिसने माउंट एवरेस्ट तक सड़क बिछा दी है। जिसकी रेलगाडिय़ां तिब्बत के पर्वतीय इलाकों में उसी रफ्तार से चलती हैं, जिस रफ्तार से शिक्यांग के मैदानी इलाकों में और जिसकी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी भी दुनिया को हैरत में डाल देती है। हम उसके मुकाबले कहां खड़े हैं? हमारे देश में सिर्फ भ्रष्टाचारियों के लिए पैसा है, तभी कोई बाबू भी करोड़पति निकल सकता है। जरूरी कामों के लिए पैसा नहीं है। सो, हम विज्ञान में पीछे हैं।

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