मंगलवार, 10 जनवरी 2012

प्रलय की भविष्यवाणी खारिज करें



यह आश्चर्य की बात है कि प्रलय के भय को अंगूठा दिखाकर सैलानियों ने प्रलय के मुहाने पर भी नए साल का जश्न मनाया। जी हां, यह सत्य है कि मैक्सिको में मय (माया) सभ्यता के जिन मंदिरों पर दर्ज तारीख को प्रलय का दिन बताया जा रहा है, उन मंदिरों को देखने के लिए दुनियाभर के पर्यटक जा पहुंचे थे, साल के आखिरी दिन। मय सभ्यता के अनुसार दुनिया 21 दिसंबर -2012 को समाप्त हो जाएगी। करीब दो हजार साल पहले तक मय सभ्यता का विस्तार केंद्रीय अमेरिका और उसके आसपास के भू-खंडों तक फैला हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे ये मंदिर वर्षा-वनों की चपेट में आकर अपना अस्तित्व खोते चले गए। मगर, प्रलय की तारीख जिस मंदिर पर खुदी है, वह तो आज भी मौजूद है।
भ्रमवश इसी तारीख को कुछ भविष्यवक्ता प्रलय की तारीख बता रहे हैं, जबकि वास्तव में प्रलय का यह भय बाजारवाद की देन है, जिसे बाजारू मीडिया भुनाने में लगा है। न्यूज चैनल इस भय को इस हद तक भुना रहे हैं कि बस प्रलय अभी आएगी और दुनिया को निगल जाएगी, पर याद रखें, प्रलय चाहे जितनी प्रबल और प्रलयंकारी आए, समूची दुनिया एकाएक खत्म होने वाली नहीं है। इस बात की सच्चाई उस प्रलय से उजागर होती है, जिसके आने के बाद न केवल दुनिया कायम रही, बल्कि मनु ने राज भी किया। जब प्रलय के कारण दुनिया समुद्र्र में समा चुकी थी, तो फिर मनु ने राज किस प्रजा पर किया था?



शतपथ ब्राह्मण और जयशंकर प्रसाद की कामायानी में जलप्लावन के विशद विवरण के साथ प्राकृतिक आपदा से उजड़े जीवन को संवारने का भी पूरा दर्शन मौजूद है। अत: प्रलय का जो भय दिखाया जा रहा है, वह गलत है। न्यूज चैनल जहां इस भय से टीआरपी बढ़ाने का धंधा कर रहे हैं, तो वहीं वैश्विक बाजार बहुराष्ट्रीय कंपनियों का माल बेचने के लिए नकारात्मक संदेश प्रचारित कर रहा है कि धनसंचय मत करो और जो संचित धन है, उसे प्रलय आने से पहले ही मौज-मस्ती में उड़ा दो।
यहां गौरतलब यह भी है कि प्रलय की अब तक जितनी भी भविष्यवाणियां हुईं, वे गलत साबित हुई हैं। हालांकि, यह सही है कि जलप्रलय महाविनाश के कारण कई बार बने हैं। हिंदू, इस्लाम और ईसाई धर्मग्रंथों में प्रलय का उल्लेख है। श्रीमद्भागवत कथा के 24वें अध्याय के मत्स्यावतार में वर्णित महाप्रलय के प्रसंगानुसार, भगवान विष्णु कहते हैं-सत्यव्रत, आज से सातवें दिन तीनों लोक समुद्र में डूब जाएंगे। तब तुम एक बड़ी नौका में समस्त प्राणियों के सूक्ष्म शरीरों, वनस्पतियों और धान्य (अनाज) के बीजों को लेकर बैठ जाना। नाव को एक बड़ी मत्स्य (मछली) खींचकर हिमालय के किनारे लगाएगी, जहां तुम नए जीवन की शुरुआत करना। यही सत्यव्रत बाद में वैवस्तर मनु कहलाए। हिमालय क्षेत्र में आने पर मनु को शतरूपा मिलीं। मनु ने उससे प्रेम किया और गर्भावस्था में छोड़कर सारस्वत प्रदेश चले गए। इस प्रदेश की रानी इड़ा थी, जो अपने राज्य की शासन व्यवस्था ठीक से नहीं चला पा रही थी। मनु ने इड़ा से प्रेम विवाह किया और सारवस्त प्रदेश की प्रजा को सुचारू शासन व्यवस्था दी।
यहां सोचने वाली बात यह है कि जब प्रलय ने समस्त प्रजा को लील लिया था, तो मनु और इड़ा ने राज किस पर किया? प्रलय का भय अब पूरब की बजाय पश्चिम से ज्यादा उठ रहा है, वह भी अमेरिका जैसे आधुनिक देश से। 21 मई-2011 को शाम छह बजे जिस प्रलय के आने की भविष्यवाणी की गई थी, वह अमेरिका के पादरी की हरकत थी। इस भविष्यवाणी का पश्चिम में इतना जबर्दस्त प्रभाव देखने में आया था कि लाखों लोग सुरक्षा की तलाश में लग गए। पूजा, प्रार्थनाएं कीं। पुण्य के फेर में अपनी जमा पूंजी भी गवां दी, पर जब प्रलय की तारीख निकल गई, तो लोगों के भय से वह पादरी भाग खड़ा हुआ। बाद में परलोक सुधारने के लिए पूंजी नष्ट कर चुके लोग अपने -अपने घरों की दिवारों से माथा पीटते नजर आए।
प्रलय की दो साल से प्रचारित की जा रही एक और तारीख 21 दिसंबर-2012 है। इस तारीख को प्रलय की संभावना मय सभ्यता के पंचांग (कैलेंडर) के आधार पर जताई जा रही है। इस पंचांग में इस तारीख को प्रलय आने का कोई उल्लेख नहीं है। दरअसल, यह पंचांग इसी तिथि तक है। मंदिर पर भी यही तिथि अंकित है। इस कारण पाखंडी भविष्यवक्ताओं ने मान लिया कि इस दिन दुनिया में प्रलय आएगी। यह अर्थ मनगढं़त है। इन लोगों से पूछना होगा कि क्या कोई ऐसा कैलेंडर अब तक बना है, जिसमें ब्रह्मांड की उम्र मापी गई है? आज हम तकनीक के युग में हैं, तो भी क्या हम आगामी एक हजार वर्ष तक का कैलेंडर बना पाए? नहीं। तब आज की तुलना में तकनीकी रूप से अक्षम रहे मय सभ्यता के लोग कैसे बना पाए होंगे? वैसे मय लोग वास्तुकला में इतने दक्ष थे कि इन्हें इसका जादूगर कहा जाता था। रामायण कालीन लंका इन्हीं ने बसाई थी। रावण की पटरानी मंदोदरी इन्हीं के वंश की थी।



नॉस्त्रेदमस ने भी 16वीं शताब्दी में भविष्यवाणी की थी कि जुलाई-1999 में प्रलय आएगी। 'सेंचुरीजÓ नाम से 1955 में प्रकाशित पुस्तक ने नॉस्त्रेदमस की इस भविष्यवाणी की घोषणा की थी, पर 1999 निकल चुका है और प्रलय नहीं आई। आज तक इस किताब की एक भी भविष्यवाणी सही नहीं निकली। प्रलय को वैज्ञानिक भी सच मान रहे हैं। वे इस खतरे को अंतरिक्ष से उतरता देख रहे हैं। अंतरिक्ष अनेक ऐसे क्षुद्रग्रहों और मलबों से भरा है, जो यदि पृथ्वी से टकरा जाएं, तो महाविनाश अवश्यंभावी है। वैज्ञानिक दावा है कि स्विफ्ट टटल नामक धूमकेतु पृथ्वी से टकाराकर महाप्रलय लाएगा। दुनिया के विनाश की आशंका नाभिकीय उष्मा से भी है। यदि परमाणु बम आतंकवादियों के हाथ लग जाएं या भूलवश विस्फोट का बटन दब जाए, तो विनाश हो जाएगा। इस ऊर्जा की विभीषिका का सामना जापान के हिरोशिमा व नागाशाकी पहले ही कर चुके हैं। फुकुशिमा भी परमाणु विकिरण के खतरे से दो-चार हो चुका है। रूस के चेरनोबिल में भी परमाणु ऊर्जा विनाश का सबब बन चुकी है।
दुनिया में सब कुछ ठीक-ठाक तो नहीं है, पर प्रलय की भविष्यवाणी खारिज करने योग्य है। प्रलय से भयभीत होने की बजाय जरूरत इसकी है कि हम प्रकृति को संतुलित बनाए रखने की कोशिशें तेज करें। उत्तर आधुनिक समाज में रोमांच कम हो गया है। पश्चिमी समाज में धन की बेशुमारी मानव-आकांक्षाओं की पूर्ति जल्द कर देती है। अत: वहां विध्वंस की कल्पानएं ही इंसान को थोड़ा-बहुत रोमांचित कर पा रही हैं, पर पूरब में ऐसा नहीं है।
धनाभाव में भी जीवन के प्रति हमारा भरोसा मजबूत है। यह जीवटता हमारे पूर्वजों में और भी ज्यादा थी। अत: वे विदेशी आक्रमणों का सामना करते हुए अपनी सस्ंकृति को अक्षुण्ण रख पाए। यह अच्छी खबर है कि प्रलय के मुहाने पर खड़े होकर लोग नए साल का जश्न मनाते रहे। कोई कुछ भी कहे, पर प्रलय से डरने की जरूरत नहीं है। उसके बाद भी जीवन बचता रहा है और बचा रहेगा।

प्रमोद भार्गव

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