मंगलवार, 3 जनवरी 2012

आंदोलन की सफलता का पैमाना भीड़ नहीं



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

अन्ना के साथ इस बार वैसी भीड़ नहीं है, जैसी इससे पहले देखी जाती रही है, पर भीड़ किसी आंदोलन की सफलता का पैमाना भी नहीं है।


यह बात तो माननी पड़ेगी कि अन्ना हजारे के आंदोलन में इस बार वैसी भीड़ नहीं है, जैसी इससे पहले देखी जाती रही है। इससे सरकार और अन्ना विरोधियों का खुश होना तो स्वाभाविक है, पर अन्ना समर्थकों की निराशा बिलकुल भी स्वाभाविक नहीं, सही नहीं। देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े आंदोलनकारी व सत्याग्रही महात्मा गांधी ने यह कई मौकों पर कहा है कि सत्याग्रह जमीन पर कम, इससे ज्यादा नागरिकों के दिलो-दिमाग में होना चाहिए। यदि इस नजरिए से देखें, तो भीड़ का जुटना आंदोलन की सफलता और भीड़ का न जुटना आंदोलन की विफलता का पैमाना नहीं है। अन्ना की सफलता का पैमाना यही है कि उनके आंदोलन को कमजोर करने के तमाम प्रयासों के बावजूद देश के सभी नागरिकों के मन में भ्रष्टाचार व भ्रष्ट-व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा है। जी हां, नागरिकों के मन में। हम उन लोगों की बात नहीं कर रहे हैं, जो सत्ता के रमणीक महलों में विराजमान हैं या उनमें घुसपैठ करने की कोशिशों में लगे हुए हैं या फिर यह सपना देख रहे हैं कि आज नहीं तो कल, एक दिन वे भी सत्ताधीश बनेंगे व देश पर शासन करेंगे। हम उन लोगों की बात भी नहीं कर रहे हैं, जो आंदोलन में क्षेत्र, भाषा, जातिवाद की गंध सूंघ रहे हैं।
प्रकारांतर से नागरिक तो ये सभी लोग हैं, पर अभी उनके मन में या तो नागरिकता-बोध का फूल पूरी तरह खिला नहीं है या फिर उसके आसपास स्वार्थों की कोई परत जम गई है। यदि हम ऐसे लोगों को छोड़ दें, तो बाकी पूरा देश अन्ना हजारे के साथ है और यही अन्ना की सफलता है। यह भी अन्ना की ही सफलता है कि देश की संसद में पहली बार भ्रष्टाचार पर जोरदार बहस हुई है व यह भी कि कमजोर ही सही, अगर कोई पेंच नहीं फंसा, तो संसद लोकपाल भी लाने जा रही है। अत: इससे क्या फर्क पड़ता है कि मुंबई के एमएमआरडीए मैदान में भीड़ रही या नहीं रही।

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