मंगलवार, 10 जनवरी 2012

मूल्यों और सिद्धांतों की परवाह किसी को नहीं



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच छत्तीस का आंकड़ा तेजी से बन रहा है। यह राजनीतिक अवसरवाद का एक और ताजा उदाहरण है।


संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। यह सही है कि सभी घटक कांगे्रस की लाइन पर चल रहे हैं और यदि विवाद कहीं हैं भी, तो वह सतह पर नहीं आ पाते, मगर ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस गाहे-बगाहे कांग्रेस को ठेंगा दिखाती रहती है। इस कारण सरकार की कई बार किरकिरी भी हो चुकी है। ममता बनर्जी ने पहले भारत-बांग्लादेश के बीच होने वाले तीस्ता नदी जल समझौते का विरोध करके प्रधानमंत्री को लाचार दिखने पर मजबूर कर दिया, तो फिर पेट्रोल की कीमतों में वृद्धि और खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश के मुद्दे पर तो उन्होंने सरकार से सीधा भिडऩे में भी संकोच नहीं किया। इतना ही नहीं, राज्यसभा में लोकपाल पर बहस के समय भी उन्होंने अपनी ही सरकार की एक न सुनी। अब बारी थी, कांग्रेस को सीधी टक्कर देने की, तो उन्होंने कोलकाता के इंदिरा भवन का नाम बदलकर उसका नाम नजरुल इस्लाम भवन करने में देर नहीं की।
जाहिर है कि ममता बनर्जी का यह रवैया साफ करता है कि अब कांग्रेस उनके लिए किसी मतलब की नहीं रही, इसीलिए वे उससे पिंड छुड़ाना चाहती हैं। यह सही है कि ममता ने जब भी केंद्र सरकार को झुकाया, उससे देश का भला ही हुआ। ममता यदि अड़ती नहीं, तो खुदरा कारोबार में विदेशी निवेश का फैसला भी सरकार नहीं बदलती। फिर भी, राजनीति का कोई सिद्धांत भी तो होना चाहिए और इस मामले में ममता 'लाजवाबÓ हैं। ममता का यकीन उस राजनीति में है, जिसमें न कोई मूल्य होते हैं, न ही सिद्धांत और न ही गठबंधन धर्म। पश्चिम बंगाल से वामपंथियों को बेदखल करने का उनका सपना पूरा हो चुका है। अत: अब उन्हें कांग्रेस की जरूरत नहीं रह गई। वे जानती हैं कि अब उन्हें कांग्रेस की नहीं, बल्कि कांग्रेस को उनकी ही जरूरत है, अपनी दिल्ली की गद्दी बचाने के लिए। सो, वे कांग्रेस से उलझी हुई हैं। देखना है कि कांग्रेस उनके दबाव में कब तक रहती है?
दरअसल, यह जो विवाद है, वह हमारी पूरी राजनीति का हाल बयां करता है। दोष हम सिर्फ ममता को ही क्यों दें? देश में ऐसा एक भी दल या नेता नहीं है, जो मूल्यों की राजनीति पर विश्वास करता हो। सबके सब सत्ता के पीछे भाग रहे हैं, इसीलिए तो इनके मूल्य और सिद्धांत भी रातोंरात बदल जाते हैं। यह स्थिति चिंता और चिंतन का विषय है, पर हम आम नागरिक राजनीति की इस स्थिति पर चिंता जताने के अलावा और कर भी क्या सकते हैं? लिहाजा, राजनीति के आंगन में तमाम नौटंकियां चालू हैं।

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