सोमवार, 23 जनवरी 2012

गुजरात हाईकोर्ट का फैसला बेहतरीन


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

नरेंद्र मोदी की छवि विकास पुरुष की है, तब लोकायुक्त से डर कैसा? राज्यपाल के माध्यम से नियुक्त लोकायुक्त को मोदी स्वीकार करें।

गुजरात हाईकोर्ट ने मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को ऐसा झटका दिया है, जिससे वे लंबे समय तक नहीं उबर पाएंगे। कोर्ट ने राज्यपाल कमला बेनीवाल द्वारा नियुक्त लोकयुक्त को सही माना है। यह विवाद भी बहुत पुराना है। उतना ही पुराना, जितनी पुरानी गुजरात में नरेंद्र मोदी की सरकार। पिछले आठ वर्षों में होता यही रहा कि लोकायुक्त के लिए जो नाम राज्य सरकार ने सुझाए, वे राजभवन को पसंद नहीं आए या न्यायपालिका को। इसके विपरीत, जो नाम न्यायपालिका ने सुझाए, वे राज्य सरकार को पसंद नहीं आए। इस प्रकार लोकायुक्त की नियुक्ति की फाइल करीब साढ़े सात वर्ष तक इस दफ्तर से उस दफ्तर चक्कर काटती रही। न्यायपालिका, राजभवन और राज्य सरकार जब एक नाम पर लंबे समय तक सहमत नहीं हो पाए, तो राज्यपाल कमला बेनीवाल ने अंत में 25 अगस्त-2010 को लोकायुक्त के पद पर सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति आरए मेहता की नियुक्ति कर दी और इस नियुक्ति को सरकार ने अपने अधिकारों में राजभवन का दखल माना।
इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा और दो न्यायाधीशों की पीठ ने उसकी सुनवाई की। इसका फैसला 11 अक्टूबर-2010 को आया, जिसमें एक न्यायाधीश ने राज्यपाल द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति को सही माना, तो दूसरे न्यायाधीश ने गलत। तब यह मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष लाया गया था, जिन्होंने बुधवार को अपना ऐतिहासिक निर्णय भी सुना दिया और जिसका सारांश यही है कि राज्यपाल द्वारा की गई लोकायुक्त की नियुक्ति गलत नहीं है। यह सही है कि यह अंतिम न्यायिक फैसला नहीं है। मोदी सरकार ने साफ कर दिया कि हाईकोर्ट के इस निर्णय के खिलाफ वह सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी और वहां से जो निर्णय आएगा, वही अंतिम होगा। अत: जो लोग गुजरात हाईकोर्ट के इस निर्णय के आधार पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का इस्तीफा मांग रहे हैं, वे तो सिर्फ राजनीति ही कर रहे हैं। इसके बावजूद, यह तो मानना ही पड़ेगा कि न्यायालय में मोदी सरकार को शिकस्त मिली है, तो इसमें मुख्यमंत्री की गलती भी कम नहीं। पूरा देश जानता है कि राज्यपाल का पद संवैधानिक होने के बावजूद उस पर बैठाए उसी दल के लोग जाते हैं, जिसकी केंद्र में सत्ता होती है। फिर भी, इस मामले में मोदी को राज्यपाल के खिलाफ मोर्चा नहीं खोलना था। मोदी की छवि विकास पुरुष की है। तब लोकायुक्त से डर कैसा? यदि वे राज्यपाल द्वारा नियुक्त लोकायुक्त को स्वीकार कर लेते, तो उनके प्रति लोगों का विश्वास और भी बढ़ जाता।

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