मंगलवार, 10 जनवरी 2012

भावनाओं में बहकर निर्णय लेने से बचें




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

प्रधानमंत्री ने प्रवासी भारतीयों के लिए मतदान का अधिकार देने का वादा किया है। ऐसा कोई निर्णय जल्दबाजी में नहीं लिया जाना चाहिए।

प्रवासी भारतीयों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वादा किया है कि जल्दी ही प्रवासियों को मतदान का अधिकार दिया जाएगा। क्या प्रधानमंत्री का यह वादा उचित है? यह सही है कि हमारे प्रवासी बंधु-बांधव भारत के विकास में अपना बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। ये प्रतिवर्ष करोड़ों डालर भारत में निवेश करते हैं। फिर, दुनिया में भारत की छवि यदि अब चमकने लगी है, तो इसका एक बड़ा कारण भी प्रवासी भारतीय हैं। हम अपने देश में चाहे जो भी करते हों, मगर दुनिया के तमाम देशों में भारत से गए हुए लोग काम के प्रति समर्पित और बहुत ही अनुशासित होते हैं। दुनिया इन्हीं का कार्य-व्यवहार देखकर हमारा आकलन करती है। अत: भारत को नई ऊंचाइयां देने में इनका योगदान नकारा नहीं जा सकता। भारत की छवि बदलने के लिए इन्होंने जो प्रयास जाने-अनजाने किए हैं, उनकी भी तारीफ होनी चाहिए। इसके बाद भी इन्हें मताधिकार देने की बात तो जरा जंचती नहीं।
दरअसल, ये लोग भारतीय मूल के हैं जरूर, पर जिन देशों में रह रहे हैं, ये अब तक वहां के विधिवत नागरिक बन चुके हैं। हमें इन पर गर्व है कि ये अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं, पर यह तथ्य भी भूलने लायक नहीं है कि अब ये हमारे लिए विदेशी हो चुके हैं। फिर, प्रधानमंत्री ने यह भी साफ नहीं किया कि वे प्रवासियों को सिर्फ मताधिकार ही देंगे या नागरिकता भी? नागरिकता दिए बिना मताधिकार का क्या औचित्य? जबकि नागरिकता देने के अपने कुछ अलग गुण-दोष हैं। मान लो, कोई भारतीय जापान में रहता है और हमने उसे यहां की नागरिकता भी दे दी। फिर, भारत और जापान के संबंध हो गए खराब, तो क्या होगा? वे भारत का साथ देंगे या जापान का? हमारा देंगे, तो जापान को और यदि जापान का देंगे, तो हमें बुरा लगेगा। प्रवासियों को ऐसी स्थिति से बचाने के लिए भावनाओं में बहकर कोई निर्णय लिया ही न जाए।

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