मंगलवार, 10 जनवरी 2012

प्रदेश में गौमाता की रक्षा का रास्ता साफ



- राजेन्द्र चतुर्वेदी
राष्ट्रपति ने मध्यप्रदेश के गौ-वंश वध प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक को मंजूरी दे दी है। यानी, प्रदेश में गौमाता की रक्षा का रास्ता साफ हुआ।


राष्ट्रपति ने अंत में मध्यप्रदेश गौ-वंश वध प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक-2010 को मंजूरी दे ही दी। यूं तो प्रदेश सरकार ने गौ-वंश की रक्षा के लिए एक कानून वर्ष-2004 में ही बना दिया था, पर उसमें कुछ खामियां थीं। लिहाजा, सरकार ने इस कानून में वर्ष -2010 में संशोधन करके उसे विधानसभा में पारित कराया था। नियमानुसार राज्य विधानसभाओं में पारित कानूनों पर राष्ट्रपति, यदि सीधे शब्दों में कहें, तो केंद्रीय गृह मंत्रालय की मुहर जरूर ही लगती है। अत: यह कानून तीन सितंबर-2010 को संस्तुति के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा गया था। फिर, 22 दिसंबर-2011 को राष्ट्रपति ने इस कानून पर मुहर लगा दी थी तथा देश के गृह मंत्रालय ने 31 दिसंबर-2011 को नोटिफिकेशन (राजपत्र) जारी कर दिया। यानी, यह कानून अस्तित्व में आने ही वाला है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद अब प्रदेश में गौ-वंश के वध पर रोक लगेगी। दरअसल, गौ-वंश वध प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक में जहां स्वयं को दोष मुक्त साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी की होगी, तो वहीं दोष सिद्ध हो जाने पर सजा की अवधि भी सात वर्ष हो गई है, जबकि प्रदेश के पुराने यानी वर्ष-2004 वाले कानून में सजा की अवधि दो वर्ष थी और दोषियों पर दस हजार रुपए का जुर्माना लगाने का प्रावधान था। संशोधित कानून में दोषियों पर कितना जुर्माना लगे या न लगे, यह निश्चित करने का अधिकार न्यायाधीशों के पास होगा। इनके अलावा, इस कानून में और भी कई खूबियां हैं। जैसे, गौ-वंश की तस्करी में लिप्त वाहनों के मालिक भी यह कहकर अब बच नहीं पाएंगे कि उन्हें पता ही नहीं था कि उनके वाहन से गायों आदि की तस्करी हो रही थी। साथ ही गौ-वंश के संवर्धन के लिए सरकार क्या करेगी, इसका उल्लेख भी कानून में है।
मतलब, इस कानून के प्रावधान साफ करते हैं कि मध्यप्रदेश सरकार हर हालत में न केवल गौमाता की रक्षा करना चाहती है, बल्कि गौ-वंश का संवर्धन भी करना चाहती है। लग रहा था कि केंद्र सरकार इस कानून को लटका देगी, जैसे कि मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों के कई जरूरी कानून वह लटकाए हुए है, पर उसने भी काफी समझदारी दिखाई और इस कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी दिला दी। इसका अर्थ यह भी है कि वह प्रदेश सरकार के गौ-वंश संवर्धन और संरक्षण अभियान से सैद्धांतिक रूप से सहमत है। तब यह सवाल भी उठेगा ही कि गौमाता की रक्षा करने के लिए वह केंद्रीय स्तर पर कोई कानून बनाने से क्यों झिझकती है?

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