मंगलवार, 10 जनवरी 2012

सच्चे लोकतंत्र के इंतजार में है देश



इधर 'भारत रत्नÓ के संदर्भ में विश्व विजयी भारतीय खिलाड़ी सचिन तेंडुलकर के नाम के साथ कई होशमंदों को हॉकी के मेजर ध्यानचंदजी का नाम भी याद आ गया है। यह भी क्यों नहीं संभव है कि कुछेक दिनों में हमारी स्मृतियां और सचेत हो उठें और हम मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, बहादुरशाह जफर को भी याद करने लग जाएं। बाद में वे सारे क्रांति नायक, जिनमें भगतसिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्लाह खां आते चले जाएंगे। पाकिस्तान से हुए एकाधिक युद्धों में जान की बाजी लगाने वाले वीर सैनिक अब्दुल हमीद वगैरह भी।

भारत की राजनीति और उसकी सरकारें चाहें, तो ऐसे तमाम लोगों की याद करके उन्हें भारत रत्न से नवाज सकती हैं। उन सैनिकों को भी, जिन्होंने हमारी लोकसभा को आतंकी हमले से बचाया और जान दे दी। ये सभी तो हमारे भारत रत्न ही हैं। वह समय भी धीरे-धीरे आ रहा है, जब आजादी के बाद का भारतीय समाज अपनी स्वाभाविक चेतना के धरातल पर लौटेगा और अपनी निर्माणकारी भूमिका का इतिहास खुद अपनी कलम से लिखेगा। सरकारें चाहे जैसा लिखवाएं, चाहें जिन-जिनको भारत रत्न बांटें, जनता के लिए कोई खास अर्थ नहीं रखता यह और जनता की स्मृति इतनी पवित्र होती है कि राजनीति कैसी भी कोशिश करके भी उसे बदल नहीं पाती।
उदाहरण से लिए, भगतसिंह और उनके साथी भले ही सरकारों के लिए उल्लेखनीय न हों, पर अपने समाज के चित्त के सिंहासन पर तो वे बगैर किसी शपथ-समारोह और घोषणा के बैठे हैं, चिरकाल तक बैठे ही रहेंगे। कोई भी सत्ता भारतीय समाज के इन सपूतों को कभी भी हमारे मनों से निकाल नहीं पाएगी। आजादी के बाद का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि जो लोग राजनीति में सक्रिय हैं, वे ही सब कुछ माने जा रहे हैं। इससे भी दुखद व विडंबनापूर्ण यह है कि अपनी तमाम अक्षमता, बदनीयती, संदिग्धता और राष्ट्रछल के बावजूद वे ही निर्णायक जगहों पर हैं और समाज उन्हीं पर अवलंबित होता जा रहा है।
वह अभी यह सोच ही नहीं पा रहा है कि उसकी अपनी सत्ता किसी भी सरकार और सत्ता-राजनीति से बड़ी है। न केवल बड़ी, बल्कि उसकी सृजनशील भूमिका ही इस राष्ट्र को एक देश के रूप में बचाए हुए है। सरकारें आती-जाती रहती हैं और रहेंगी, पर समाज और लोक बने रहेंगे। इसलिए अब समाज को आगे आकर नए सिरे से अपने मानकों के बारे में सोचना होगा। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो अपनी उपस्थिति व पहचान का भी अर्थ खो देगा। आजादी से पहले के दिनों में राजाराम मोहनराय, दयानंद, ज्योतिबा फुले, विवेकानंद जैसों ने सामाजिक सामथ्र्य का परिचय दिया। खुद गांधी, अंबेडकर, लोहिया ने सामाजिक सामथ्र्य का परिचय दिया। राजनीति और उसके द्वारा किया गया सामाजिक नवनिर्माण आधा-अधूरा और बेमानी है। यह भी कि राजनीति समाज की कोख से जन्म लेती है, इसलिए उसकी बुनियादी जिम्मेदारी सामाजिक हितों की सुरक्षा और सुव्यवस्था का विधान करना होता है।
अफसोस कि अधिकांश राजनीतिक दलों के लिए समूचा और विविधतामय भारतीय समाज अपना नहीं महसूस होता। उनके वोटरों को ही वे अपना सच्चा नागरिक मानते हैं। आज जो लोग सत्ता में हैं, उनका कोई नैतिक प्रभाव इस विशाल भारतीय समाज पर नहीं है। वे चाहे सरकार में हों या विपक्ष में, उन सबकी राजनीति अब सिर्फ राजनीति के लिए है, उनकी अपनी पार्टी की राजनीति के लिए। आश्चर्य तो यह कि कल तक जो संस्कृति, राष्ट्रीयता और चरित्र की राजनीति की दावेदारी कर रहे थे, वे अब लोगों की निगाह से उतर चुके हैं। अत: सामाजिक जीवन में निराशा का भाव भी बढ़ता जा रहा है। ले-देकर अन्ना हजारे, मेधा पाटकर आदि हैं, जिन्हें सत्ता-राजनीति कई तरह से घेरने की योजनाएं बनाती रहती है। अब यह लोगों की समझ पर निर्भर है कि वे अपने सच्चे हितैषी की पहचान करें। अगर ऐसा नहीं हो पाता और लोक समाज अपनी भूमिका निभाने में पिछड़ता व चूकता है, तो यह एक भयानक ऐतिहासिक गलती होगी। आज भारत के लोगों का एक हिस्सा अपना लोकतंत्र पाने को व्याकुल है, ठीक पराधीनकाल में आजादी के दीवानों की तरह। यह दीवानगी सुखद व खूबसूरत है, उम्मीद जगाती है।
यह भी बताती है कि भारत का लोक-समाज अभी मरा नहीं, जिंदा है। जिस दिन वह नए सिरे से मुट्ठियां बांधेगा, कसमें लेगा, कैसी भी राष्ट्रघाती सत्ता-राजनीति को ठिकाने लगा देगा। पहले के युगों और सदियों में वह ऐसा कर चुका है। उसके ये अनुभव उसके संस्कारों में हैं। बस, याद भर करने की देर है। जिस दिन याद कर लेगा, भारत में फिर एक महान क्रांतिकारी आंदोलन खड़ा हो उठेगा। यह आंधी अब आने ही वाली है। तूफान उठने ही वाला है।
जिन लोगों को भी अपने आपसे अपने इस देश से प्यार है, उनका फर्ज बनता है कि वे रोज-रोज तरह-तरह से बिखरते इस समाज को एकत्र करने के लिए आगे आएं। क्या हम कभी भी यह नहीं सोच पाएंगे कि हम केवल एक व्यक्ति नहीं हैं, इकाई भी नहीं, हम उस विशाल-विराट राष्ट्र के ऐसे अंश हैं, जिसके बगैर राष्ट्र बनता ही नहीं। राष्ट्र अगर समुद्र है, तो हम सब उसकी बूंदें हैं। हमारे अस्तित्व से उसका और उसके अस्तित्व से हमारा अपना अस्तित्व बनता है। इसलिए हमें नए सिरे से निर्माण में लगना होगा कि गुलशन बचा रहे, रेगिस्तान न बनने पाए। यह काम इतना बड़ा, जटिल, कठिन और जिम्मेदारीभरा है कि इसमें ठीक वैसे ही सामूहिक बल की जरूरत पड़ेगी, जैसी परतंत्रता के दिनों में पड़ी थी। भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा अपनी आजादी के लिए बेचैन होकर अंग्रेजी राज के पांव उखाडऩे में लग गया था। वह दिन भी आया, जब उसके सपने पूरे हुए और अंग्रेज मजबूर होकर यहां से गए, पर जब तक रहे, तब तक खूब लूटते रहे।
आज उनकी जगह कुछ हमारे अपने ही लोग वही सब करने में लगे हैं। कहने को हम स्वतंत्र हैं, अपने तंत्र में हैं, पर हमारा अपना यह तंत्र ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बना बैठा है। हमने उसे देश चलाने का अधिकार सौंपा है, वह लूटने में लगा है। मजेदार बात यह कि वह चाहता है कि यह सब बदस्तूर चलता रहे, कोई बोले नहीं। अगर कोई ऐसी हिमाकत करे, तो उसे पाठ पढ़ाया जाए। इसी वातावरण में कुछ अजीब-बेहूदे संदर्भ भी उठ खड़े होते हैं। खेल के क्षेत्र में भारत रत्न किसे पहले दिया जाए, ऐसा ही संदर्भ है। भारत अगर एक स्वाधीन और संप्रभु राष्ट्र है, तो इसे इस स्वाधीनता तक पहुंचाने वाले लोग भारत-रत्न पाने और कहलाने के सबसे बड़े अधिकारी हैं, वे चाहे किसान हों या सैनिक, वैज्ञानिक हों या कलाकार, कवि, दार्शनिक हों, समाजसेवी हों या राजनीति कर्मी। खेद है कि वर्ण-वर्ग, जाति-उपजाति में बंटा यह भारतीय समाज अभी इस तरह के विभाजनों से मुक्त होकर सोच ही नहीं पाता। राजनीति में बैठे हुए अधिकांश सामंती मानस के लोग हैं। ऐसे लोग सच्चे लोकतंत्र को कैसे आने देंगे?

- विजय बहादुर सिंह

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