सोमवार, 23 जनवरी 2012

रुश्दी की भारत यात्रा रद्द होने का मतलब




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

सलमान रुश्दी जयपुर नहीं आए। वैसे इसकी घोषणा उन्होंने स्वयं की है, पर उन्हें रोकने के लिए हमारी सरकार ने भी कुछ तो किया होगा!

जयपुर में साहित्य महोत्सव शुरू हो चुका है, लेकिन सलमान रुश्दी के आने को लेकर जो अंदेशा था, वही हुआ। वह इस महा-आयोजन में नहीं आएंगे। सुनने को तो यही मिला है कि सलमान रुश्दी ने अपनी भारत यात्रा स्वयं टाल दी है, पर बात सिर्फ इतनी ही नहीं है। चूंकि सलमान रुश्दी तस्लीमा नसरीन की तरह हिम्मत वाले व्यक्ति नहीं हैं। जो उनको जानते हैं, वे कहते हैं कि रुश्दी बेहद डरपोक इंसान हैं। अत: झंझटों से बचने के लिए उन्होंने यह भारत यात्रा टाल दी होगी, पर सच यह भी है कि चाहता भी कौन था कि सलमान रुश्दी भारत आएं। केंद्र सरकार कह रही थी कि यदि रुश्दी आते हैं, तो उन्हें रोका नहीं जाएगा, पर उसकी छिपी हुई मंशा यही थी कि यदि यह बला भारत आए ही नहीं, तो ही ठीक। वहीं, राजस्थान सरकार तो इसके लिए पापड़ बेल ही रही थी कि रुश्दी को जयपुर आना नहीं चाहिए। राजस्थान के मुख्यमंत्री और देश के गृह मंत्री के बीच रुश्दी प्रकरण पर एक बार तो बैठक भी हुई थी और उसी में रुश्दी को भारत न आने देने की इबारत लिख दी गई होगी, यही आशंका है। संभव है कि इन लोगों ने उन्हें यहां न आने के लिए राजी किया हो और रुश्दी मान गए हों।
हुआ जो भी हो, चाहे तो रुश्दी खुद न आए हों और चाहे उन्हें भारत और राजस्थान सरकार ने गोटियां बिछाकर आने से रोका हो, मगर यह गलत हुआ। इससे दुनिया में भारत के लोकतंत्र की छवि एक कमजोर व्यवस्था वाले देश के रूप में बनी होगी। विश्व की एक ताकत बनने की ओर अग्रसर भारत की छवि ऐसी नहीं बननी चाहिए थी। वैसे चूंकि रुश्दी ने स्वयं भारत आने से इंकार किया, इसलिए सरकार की नाक तो बच गई है, पर इससे देश में कट्टर-पंथ को बढ़ावा भी मिलेगा, जोकि नहीं मिलना चाहिए, चाहे वह किसी भी धर्म के हों। सरकारों को यह कौन समझाए कि देश भावनाओं से नहीं, नियम-कानूनों और संविधान से चलता है।

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