बुधवार, 18 जनवरी 2012

नकली और मिलावटी दूध का गोरखधंधा



- राजेन्द्र चतुर्वेदी

देश में जो दूध बिक रहा है, उसका लगभग 70 फीसदी हिस्सा नकली या मिलावटी है। वक्त आ गया है कि इस गोरखधंधे पर लगाम कसी जाए। खाद्य सुरक्षा व मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के एक खुलासे के मुताबिक देश की राजधानी दिल्ली में बिकने वाला 70 फीसदी दूध धीमे जहर की तरह है, तो बाकी देश में बिकने वाला करीब 68.4 फीसदी दूध। यह तस्वीर शहरी भारत की है, जबकि ग्रामीण भारत की तस्वीर इससे थोड़ी बेहतर है।


वहां सिर्फ 31 फीसदी दूध में ही मिलावट पाई गई है, यंू कम तो 31 फीसदी भी नहीं होता। बहरहाल, यदि दूध में मिलावट होने के यह नतीजे किसी गैर-सरकारी संगठन ने निकाले होते, तब उन पर संदेह की गुंजाइश थी, लेकिन एफएसएसएआई भारत सरकार की संस्था है। अत: इसके निष्कर्षों पर संदेह की कोई गुंजाइश नहीं और स्थिति यह है कि हमें जो दूध मिल रहा है, वह पौष्टिक तो है ही नहीं, हमें गंभीर रूप से बीमार भी कर सकता है। यह बात और है कि देश में कुछ राज्य ऐसे भी हैं, जहां के दुग्ध उत्पादक अब भी शुद्ध दूध बेचते हैं और प्रसन्नता की बात यह है कि तमिलनाडु, कर्नाटक के साथ ही साथ शुद्ध दूध वाले राज्यों की सूची में हमारा मध्यप्रदेश भी शामिल है। मगर, देश के स्तर पर तस्वीर डरावनी है।
बताया जा रहा है कि दूध में सिर्फ मिलावट ही नहीं हो रही है, बल्कि यूरिया, साबुन का झाग, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तेलों आदि से सौ फीसदी नकली दूध भी बनाया और बेचा जा रहा है। जो लोग चंद पैसों के लिए इंसानों को धीमा जहर परोस रहे हैं, वे तो राक्षसों से भी गए बीते हैं ही, मानना यह भी पड़ेगा कि न तो मिलावट रोकने वाला हमारा तंत्र प्रभावशाली है और न ही ऐसी गतिविधियों में लिप्त अपराधियों को कठोर सजा का प्रावधान भी है। अव्वल तो भ्रष्टाचार के कारण मिलावटखोर पकड़े ही नहीं जाते और यदि पकड़े गए, तो दूसरे-तीसरे ही दिन जेल से बाहर आ जाते हैं। उम्मीद है कि एफएसएसएआई की रिपोर्ट के बाद हमारी सरकारें जागेंगी तथा मिलावटखोरी पर रोक लगाएंगी।

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