बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

न्यायपालिका में बढ़ गई देश की आस्था

- राजेन्द्र चतुर्वेदी

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने तीन महत्वपूर्ण फैसले दिए हैं। इनसे देश की जनता में अपनी न्यायपालिका के प्रति आस्था और बढ़ गई है।


गुरुवार का दिन सुप्रीम कोर्ट के नाम रहा। इस दिन तीन खास फैसले आए। एक-टूजी वाले मामले में पी. चिदंबरम के खिलाफ जांच होगी या नहीं, इसका फैसला निचली अदालत करेगी? दो-टूजी घोटाले की जांच कर रही सीबीआई की निगरानी के लिए एसआईटी के गठन की मांग को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया और तीन -पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा द्वारा आवंटित किए गए टूजी स्पेक्ट्रम के 122 लाइसेंस रद्द कर दिए गए तथा इस गड़बड़ी में शामिल पाई गईं तीन दूरसंचार कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया गया। वैसे तो ये तीनों फैसले अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पी. चिदंबरम को फौरी राहत चाहे भले ही मिल गई हो, पर सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा है कि चिदंबरम को टूजी में सह आरोपी बनाया नहीं जा सकता। इधर, एसआईटी के गठन की प्रशांत भूषण की मांग को चाहे भले ही खारिज कर दिया गया हो, पर कोर्ट ने यह तो कह ही दिया कि सीबीआई की निगरानी सीवीसी द्वारा होगी।
उल्लेखनीय यह है कि जब से कोर्ट ने अपनी निगरानी वापस ली थी, तब से ही सीबीआई टूजी की स्वतंत्र जांच कर रही थी, तो अब फैसले में चूंकि सीवीसी का नाम आ ही गया है, इसीलिए तो अब सीबीआई की निगरानी सीवीसी को करनी ही पड़ेगी। तब इन दोनों फैसलों का महत्व अपने आप स्थापित हो जाता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का तीसरा फैसला, जिसमें टूजी स्पेक्ट्रम के सभी के सभी लाईसेंस रद्द कर दिए गए हैं, वह कुछ ज्यादा ही महत्वपूर्ण है। अदालत ने दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) को निर्देश दिया है कि वह टूजी लाइसेंस आवंटन के लिए नई सिफारिशें दे, तो संचार मंत्रालय को निर्देश दिया है कि वह टूजी स्पेक्ट्रम की फिर से नीलामी कराए और वह भी चार महीने के अंदर।
मतलब, टूजी की जब फिर से नीलामी होगी, तो उस नुकसान की भरपाई भी हो जाएगी, जो राजा की कृपा से हुए इसके आवंटन में देश को हो चुका है। इस प्रकार, न्यायालय के ये तीनों फैसले ऐतिहासिक होने से भी आगे निकल गए हैं। इनसे जहां नागरिकों का अपनी न्यायपालिका पर भरोसा बढ़ा है, तो वहीं केंद्र सरकार की थोड़ी और किरकिरी हो गई है। वैसे कांग्रेस ने अदालत के इन फैसलों का स्वागत किया है, क्योंकि उसके पास और रास्ता ही क्या था, पर नैतिकता का तकाजा यह है कि पी. चिदंबरम इस्तीफा दें। मगर, देश जानता है कि चिदंबरम लाल बहादुर शास्त्री नहीं हैं और युग भी नेहरूजी का नहीं, मनमोहन सिंह का है।


पोंटी चड्ढा तो केवल एक उदाहरण है

पोंटी चड्ढा इस बात का उदाहरण है कि सत्ता और सत्ता के करीबी देश को किस बेरहमी से लूट रहे हैं और जनता का हक मार रहे हैं।
पोंटी चड्ढा इस बात का उदाहरण है कि सत्ताधीश स्वयं तो यथासंभव राजकोष को चूना लगाते ही हैं, अपने करीबियों पर भी इतनी 'मेहरबानीÓ बनाए रखते हैं कि वे भी अपनी तिजोरियां भर सकें। कौन पोंटी चड्ढा? वही, जो पांच-छह वर्ष पहले तक उत्तर -प्रदेश का एक छोटा-मोटा जमीनों-मकानों का दलाल (प्रापर्टी डीलर) व शराब का एक छोटा-सा कारोबारी हुआ करता था, मगर अब जबकि बुधवार को दिल्ली, नोएडा, लखनऊ स्थित कुल 13 ठिकानों पर आयकर का छापा पड़ा, तो पाया गया कि यह व्यक्ति अरबों में खेल रहा था। उसके नोएडा के मॉल में एक तलघर है, जिसमें एक तिजोरी थी, जो कि नोटों की गड्डियों से खचाखच भरी हुई थी। गिनती की गई, तो पता चला कि नकदी दो सौ करोड़ रुपयों की निकली। इसके साथ ही करोड़ों रुपए के लेन-देन के कागजात भी बरामद हुए और आयकर विभाग की मानें, तो पोंटी का भारी-भरकम पैसा फिल्मों से लेकर जमीन के कारोबार और शेयर बाजार तक में लगा हुआ है। शराब और रियल इस्टेट का एक बड़ा भारी कारोबारी तो मोंटी चड्ढा बन ही चुका है।
उसके पास दौलत की इतनी बरसात कहां से हुई? इस सवाल का केवल एक ही उत्तर है कि वह उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री का बेहद करीबी था। तब आरोप यह भी लगाया जा सकता है व लग भी रहा है कि उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने पोंटी को लूट की खुली छूट दे रखी होगी, तभी तो वह 'कुबेरÓ बन गया। हमारी राजनीति दरअसल जिस दिशा में गई है, उसमें उसका पोंटी-करण ही ज्यादा हुआ है। यहां सत्ताएं जनता की सेवा करने के नाम पर बनती हैं, पर पोंटियों की सेवा में लग जाती हैं और बदले में पोंटी भी सत्ता की सेवा करते हैं। यदि देश को इस लूट से बचाना है, तो जनता को जागना ही होगा और सत्ता तथा सत्ताओं के पालतू पोंटियों से उनके कुकर्मों का हिसाब मांगना ही होगा।

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