गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

राजनीति करने का हक हमारा भी है

सारे राजनेता धीरे-धीरे अपने-अपने बेटे-बेटियों को राजनीति के सबसे मलाईदार व ताकतवर धंधे में लगा रहे हैं। राजनीति का धंधा अब हो भी ऐसा गया है कि इसमें चारों ओर से फायदा ही फायदा है। आप घोटाले में फंस जाएं, तो सरकारी एजेंसियां ही आपको बचाने के लिए बेचैन हो उठेंगी। बोफोर्स में ऐसा हुआ ही। आज विश्वनाथ प्रताप सिंह होते, तो उन्हें यह झूठ बोलने के लिए या तो कड़ा दंड मिलता या फिर कठोर प्रताडऩा कि बोफोर्स में घूसखोरी हुई।
नरसिंहराव ने अपनी सरकार बचाने के लिए झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन आदि को खरीदा व ठाट से पांच साल सत्ता में रहे। यह और बात है कि उन्हीं के शासनकाल में बाबरी मस्जिद मटियामेट कर दी गई। मुकदमे पर मुकदमे जारी हैं, पर मस्जिद, जो भारत के मध्ययुग का पुरातात्विक इतिहास लिए हुए थी, नेस्तनाबूद की जा चुकी है। कांग्रेस इसके बदले अब चार प्रतिशत आरक्षण लेकर आई है। 'ओ, भारत के मुसलमानो! अब तो खुश हो जाओ।Ó भाजपा के लोग 'मंदिर वहीं बनाएंगेÓ का नारा लेकर आए और हिंदुओं के भोले-भाले समूहों के बीच झूठे साबित हुए। तब भी न कांग्रेस का कुछ बिगड़ा, न भाजपा का।
बिगड़ा अगर किसी का, तो उस आम भारतीय नागरिक का, जो गरीबी, महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकारी अत्याचारों को अब भी झेल रहा है। राजनीति है ही इतनी फायदेमंद कि आप जहां-जहां भी फंसोगे, वहां-वहां आपके तरह-तरह के मददगार आ खड़े होंगे। चूंकि आप ताकतवर हैं और सत्ता के बड़े पद पर हैं, तो सैकड़ों लोग आप पर मर मिटने को तैयार मिलेंगे। गांधी को जिसने गोली मारी, एक प्रकार से उसने राष्ट्र को ही अपना निशाना बनाया, पर ऐसा राजनीतिक उपद्रव नहीं मचा, जैसा एक तमाचा जडऩे पर अभी-अभी महाराष्ट्र में हुआ। सवाल यह कि क्या गांधी राजनेता नहीं थे?
वे कैसी राजनीति कर रहे थे कि उनकी हत्या पर सारा देश शोक में डूब गया, जबकि इंदिरा गांधी की सिख अंगरक्षकों द्वारा निर्मम हत्या किए जाने पर हजारों सिख परिवारों का भयंकर नरसंहार किया गया? गांधी और इंदिरा गांधी की राजनीति में आखिर वह कौन-सा बुनियादी फर्क था, जिसे समझ और महसूस कर इस महान देश ने गांधी के प्रति अपनी अलग निगाह बनाई और नेहरू, इंदिरा गांधी और उनके बाद के लोगों को लेकर एकदम भिन्न राय। तब क्या गांधी महात्मा भर थे, राजनेता नहीं थे? जवाब होगा, राजनेता ही थे, पर वैसे नहीं, जैसे पंडित नेहरू और उनके बाद के सारे प्रधानमंत्री और मंत्री लोग थे या आज के लोग हैं।
इस दोनों तरह की राजनीति में जो फर्क था, उसे अगर हम महाभारत के पात्रों और चरित्रों के आधार पर समझना चाहें, तो एक तरफ धृतराष्ट्र, उनके साले शकुनि, पुत्रगण-दुर्योधन व दु:शासन आदि, यहां तक कि महामना भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और सूर्य पुत्र कर्ण तक शामिल हैं। इनकी राजनीति कुल मिलकार दुर्योधन को सत्ता में लाना और बनाए रखना थी। हम नए किस्म के भारतीयों को आश्चर्य में पडऩा और चकित होना नहीं चाहिए कि भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य जैसे उस युग के महामनीषी लोग दुर्योधन के दरबारी बने हुए थे।
ये सब, यदि महाभारत की कथा को हम अपने सांस्कृतिक इतिहास का हिस्सा मान लें, तो हमारे अपने ही पूर्वज लोग थे, जिनकी आंखें बंद थीं और दिमागों पर स्वार्थों की पट्टी चढ़ी हुई थी। इन सबको अपने-अपने टुच्चे स्वार्थ घेरे हुए थे, इसलिए जुबान अगर खोलते भी थे, तो दुर्योधन का रुख समझकर। महाभारत काल की यह वह खतरनाक राजनीति थी, जिसमें कोई सुरक्षित नहीं था।
तब आते हैं कृष्ण, एक नए नारे के साथ कि वे कोई राजनीति नहीं करेंगे। न कौरवों के पक्ष में लड़ेंगे, न पांडवों के। महाभारत की कथा की बारीकी पर विचार करें, तो दुर्योधन कृष्ण की सेना मांगकर ले जाता है। पांडवों के हिस्से में सेनाहीन कृष्ण आते हैं, अर्जुन के सारथी बनकर।
यह कथा हमें बताती है कि महाभारत में जो सबसे बड़ा राजनीतिज्ञ है, वह तो कृष्ण ही है। विश्व प्रसिद्ध भारतीय धर्मग्रंथ गीता की सबसे बड़ी राजनीतिक शिक्षा यही है कि जो राजनीति अन्याय प्रेरित हो, उसका विनाश नहीं, बल्कि मानव-धर्म की रक्षा करने के लिए वह राजनीति भी जरूर की जानी चाहिए, जिसे कृष्ण करते रहे हैं। गांधी जैसे पुरुषोत्तम इसीलिए गीता को अपनी पथ-प्रदर्शक पुस्तक मानते हैं। उन लोगों की तरह नहीं, जो जय गीता, जय गीता तो करते हैं, पर गीता के मर्म को समझने की योग्यता नहीं रखते। इन अंधे कठमुल्लों में और उन आधुनिक कठमुल्लों में कोई भारी अंतर नहीं है, जो गीता को हिंदुओं की एक पोथी मात्र मान उसकी ओर देखना भी नहीं चाहते।
ये दोनों ही भारत व आधुनिक भारतीय समाज के लिए हानिकारक हैं। बात गांधी की राजनीति के संदर्भ में हो रही थी। हम दुनिया के लोग गांधी को चाहे जितना बड़ा महात्मा मानें, पर वे स्वयं को परंपरागत अर्थों में राजनीतिज्ञ ही मानते थे। कैसा राजनीतिज्ञ? वह, जिसका प्रत्येक कर्म समस्त देश और मानवता के लिए समर्पित और कल्याणकारी हो। अवसर आने पर जो अपने तमाम निजी स्वार्थों की बलि चढ़ाकर देश और सारी मानवता के लिए आत्म-बलिदान कर सके। गांधी यही थे।
भारत में जो राजनेताओं की स्मरणीय सूची है, उसमें सत्य हरिश्चंद्र, राम, युधिष्ठिर और अशोक, विक्रमादित्य आदि हैं। मुगल बादशाहों में अकबर की याद की जाती है। औरंगजेब को उस तरह याद नहीं किया जाता, जिस आत्मीयता और भावना से दाराशिकोह याद आते हैं। क्यों? इसलिए कि ये वे लोग थे, जिनकी राजनीति का मतलब था, लोक-कल्याण। भले ही ये कृष्ण के पासंग बराबर भी न हों, लेकिन इनकी राजनीति हमारे आज के सांसदों, विधायकों से कहीं ऊंची और श्रेष्ठ थी।
आज बहुत कम सांसद और विधायक हैं, जो देश और समाज के उद्धार के लिए राजनीति में आते हैं। इसके विपरीत, वे सत्ता पाने और अपने स्वार्थों की घिनौनी पूर्तियों के लिए, सुविधाएं खोजने और सुरक्षा पाने के लिए आते हैं। संसद की बहसें, लोकपाल पर लालू और मुलायम जैसे नेताओं के भय यह स्पष्ट करने के लिए काफी हैं कि इनका चरित्र कैसा है? इनमें नैतिक साहस कितना है? यही हाल तमाम पार्टियों, उनके बॉसेज और व्हिप के इशारों पर उठने-बैठने वाले सांसदों का है।
तब जो राजनीति ये कर रहे हैं, वह गांधी वाली है या दुर्योधन वाली, समझने में कठिन नहीं। अन्ना हजारे के लिए कहा जा रहा है कि वे अब अनशन की राजनीति कर रहे हैं। मेरा कहना है कि उन्हें जरूर ऐसा करना चाहिए, क्योंकि राजनीति सिर्फ चंद घरानों और भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं की बपौती नहीं है। अगर वे चाहें भी, तो भी हमारा यह करना वे रोक नहीं पाएंगे। यह हमारा अधिकार है।

- विजय बहादुर सिंह

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