गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

प्रति-व्यक्ति आय की मुनादी का मतलब




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

जब सरकार दावा कर रही है, तो देश में प्रति-व्यक्ति आय भी निश्चित ही बढ़ी होगी, पर क्या इससे देश की आम जनता को लाभ मिला है?

भारत जैसे भारी आबादी वाले देश में पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को सही सिद्ध करने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं तो भारी धतकरम करती ही हैं, हमारी अपनी सरकार भी पीछे नहीं रहती। कभी पूंजीपतियों की सूची जारी की जाती है और उसमें बताया जाता है कि उनकी दौलत में कितना इजाफा हुआ, तो कभी-कभी विकास दर के गीत गुनगुनाए जाते हैं, ताकि देश इस बात को पचा ले कि पूंजीवादी-बाजारवादी आर्थिक नीतियां हमारे लिए बहुत कल्याणकारी हैं। ऐसा ही एक नया शिगूफा फिर छोड़ा गया है। केंद्र सरकार ने बताया है कि भारत में बीते वर्ष प्रति-व्यक्ति आय में भारी इजाफा हुआ है। वित्त वर्ष-2009-10 में जहां भारत की प्रति-व्यक्ति आय 46117 रुपए थी, तो वहीं वित्त वर्ष-2010-11 में यह बढ़कर 53331 रुपए प्रति-व्यक्ति हो गई है।
यह कैसे कहें कि प्रति-व्यक्ति आय बढ़ी नहीं होगी। जब देश की सरकार उत्साहित होकर इसका दावा कर रही है, तो उसको हम गलत भी नहीं कह सकते। उसका यह दावा भी सही है कि पिछले वर्ष के मुकाबले भारत अब और भी अमीर हो गया है। देश में धन का बढऩा देश का अमीर होना ही तो है, मगर दावा यदि यह किया जाए कि सभी भारतीय अमीर हो गए हैं, तो यह देश की आंखों में धूल झोंकने जैसा ही है। दरअसल, शुरुआत में भारत समाजवादी तो था, पर हम आर्थिक असमानता को समाप्त करने का कार्य पूरा भी नहीं कर पाए कि उससे पहले ही देश को पूंजीवाद के रास्ते पर चलाना शुरू कर दिया गया था। मतलब, आर्थिक असमानता तो समाजवादी भारत में ही बरकरार थी, क्योंकि आजाद देश में हमने अपने लिए मिली-जुली अर्थव्यवस्था चुनी थी। यानी, न तो पूरी तरह से समाजवादी और न ही पूरी तरह से बाजारवादी।
नेताओं का लक्ष्य भारत को समाजवादी बनाना था, पर स्वर्गीय राजीव गांधी अपने शासनकाल में इस लक्ष्य से विचलित हो गए, तो स्वर्गीय नरसिंहाराव ने तो अर्थव्यवस्था की दिशा ही बदल दी थी, लिहाजा आज के भारत में उतनी आर्थिक असमानता है, जैसी वर्ष-1984 से पहले के भारत में नहीं थी। फिलहाल, देश तीन वर्गों-उच्च, मध्यम और निम्न में विभाजित हो गया है। देश में निम्न वर्ग की आबादी सबसे ज्यादा है और उसकी आमदनी में कोई इजाफा नहीं हुआ होगा, यह बात सरकारी नीतियों को देखकर नि:संकोच होकर कही जा सकती है। मगर, सरकार को पूंजीवादी नीतियों को देश के गले उतारना है। अत: प्रति-व्यक्ति आय बढऩे की मुनादी पीटी जा रही है और गरीबों की अनदेखी हो रही है।

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