गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

राष्ट्रवाद की भावना जगाने का मौका


राजेन्द्र चतुर्वेदी

गणतंत्र दिवस पर हमें नागरिकता, भारतीयता -बोध को जगाने का संकल्प लेना होगा। हम राष्ट्रवादी नहीं होंगे, तो समस्याएं बनी रहेंगी।

आज हम अपने गणतंत्र की 62वीं वर्षगांठ मना रहे हैं। सतर्क रहें, ताकि यह उत्सव कोई औपचारिक उत्सव बनकर न रह जाए। तिरंगा फहरा लेना, 'जन गण मनÓ गा लेना और छुट्टी मना लेना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इस दिवस को अपने अंदर के सोए हुए नागरिकता बोध को जगा लेने का मौका बनाना होगा। क्यों? इसलिए कि देश तमाम तरह की विसंगतियों, विद्रूपताओं व समस्याओं से घिरा हुआ है। चिंता की बात यह है कि समय गुजरने के साथ-साथ समस्याएं कम नहीं हो रही हैं, बल्कि और बढ़ती जा रही हैं। खुद विचार कीजिए कि साल-दर-साल देश की समस्याएं क्या और-और गंभीर नहीं होती जा रही हैं?
क्या आजादी के फौरन बाद जो समस्याएं देश के सामने थीं, वह आजाद भारत में विकराल नहीं होती गई हैं? जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण के लिए हमने क्या किया? क्या हम बेरोजगारी की समस्या को सुलझा पाए? क्या गरीबी का खात्मा हुआ? क्या इस देश में अब भूख से कोई नहीं मरता? क्या देश के सभी नागरिकों के लिए पर्याप्त तादाद में स्कूल और अस्पताल खुल गए हैं? क्या भाषावाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद व जातिवाद जैसी समस्याओं का समाधान हमने खोज लिया है? क्या राजनीति में नव-सामंतवाद का उदय नहीं हो गया है? क्या देश की आधी से ज्यादा राजनीति डेढ़-पौने दो सौ राजनीतिक परिवारों की बंधक नहीं हो गई है? भ्रष्टाचार कम हुआ है या फिर बढ़ गया है? इन सभी सवालों पर विचार करो, तो यह दावे से कहा जा सकता है कि उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा।
पिछले एक-डेढ़ दशक से सरकारें विकास का दावा करने लगी हैं। यदि धरती का पेट चीरकर और वनों को बर्बाद करके खनिज निकालना, यदि किसानों की जमीने हड़पकर शांपिंग मॉल खुलवाना, यदि चंद पूंजीपतियों को ऊंची-ऊंची इमारतें बनाने की अनुमति देना, यदि धनपतियों के लिए पांच-सात सितारा होटलों की तर्ज पर स्कूल और अस्पताल खुलवाना विकास है, तो निश्चित ही भारत ने विकास भी किया है। मगर, यदि विकास की परिभाषा यह है कि सभी बच्चों को उनकी प्रतिभा के विकास के लिए उचित शिक्षण संस्थान मिलें, यदि विकास की परिभाषा यह है कि देश के सभी नागरिकों को उम्दा भोजन, स्वास्थ्य, वस्त्र और आवास मिलें, तो फिर हमने जो विकास किया है, वह किसी मतलब का नहीं है। एक और सच यह भी है कि सरकारें विकास दर की बातें तो करती हैं, लेकिन विकास की परिभाषा नहीं बतातीं कि विकास है, क्या?
जब से भारत संविधान में वर्णित समाजवाद का रास्ता छोड़कर पूंजीवाद के रास्ते पर चला है, तब से देश में एक नव-धनाड्य वर्ग जरूर पैदा हो गया है। इस वर्ग में शामिल लोगों की तादाद ज्यादा से ज्यादा चार-पांच लाख होगी। 24-25 करोड़ लोगों का एक मध्यम वर्ग भी मजबूत हुआ है, पर देश की आबादी 25-26 करोड़ नहीं, बल्कि एक अरब 21 करोड़ है। जाहिर है, देश में 90-95 करोड़ लोगों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसमें से आधे लोग तो अभावग्रस्त हैं, जबकि आधे जैसे-तैसे, किसी भी तरह जिंदा हैं। यह वही वर्ग है, जिसकी शिनाख्त असित सेनगुप्ता समिति ने बीस रुपए या इससे कम कमाने वाले वर्ग के रूप में की है। इस वर्ग के कल्याण के बिना भारत शहीदों के सपनों का देश बन नहीं सकता।
यह भी पूंजीवाद का 'चमत्कारÓ है कि देश में भ्रष्टाचार के 'अवसरÓ भी बढ़ गए हैं। दरअसल, पैसा कई तरीके से देश में आ रहा है। हम अरबों का कर्ज ले रहे हैं, दूसरे देशों को अपने देश में निवेश करने के लिए आमंत्रण दे रहे हैं, यह भी कर्ज ही है। फिर, दूसरे देशों के पूंजीपति भी पूंजी निवेश कर रहे हैं। तभी, जो लोग सत्ता या व्यवस्था में हैं, उन्हें लूटने-खसोटने का ज्यादा मौका मिल गया है। इसका एक परिणाम तो यह है कि अब घोटाले करोड़ों के नहीं होते, बल्कि हजारों करोड़ के होते हैं, तो दूसरा परिणाम यह है कि अब चपरासी भी करोड़पति निकलने लगे हैं, आयकर या लोकायुक्त के छापों में।
इन सभी समस्याओं का समाधान क्या है? यही कि नागरिक अपना नागरिकता बोध जगाएं। यह सच सुनकर न तो भावुक होने की जरूरत है और न ही सच को झुठलाने के लिए कुतर्क गढऩे की कि हम नागरिकों में नागरिकता बोध का घोर अभाव है। हम भारतीय कम, किसी क्षेत्र, भाषा, जाति या धर्म विशेष के व्यक्ति ज्यादा हैं। लिहाजा, हमारी इन्हीं विसंगतियों को राजनीतिज्ञ चुनाव के समय उभार देते हैं और चुनाव जीत लेते हैं। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, पर यह आश्चर्य से ज्यादा अफसोस की बात है कि वहां भ्रष्टाचार या अन्य समस्याएं चुनावी मुद्दा नहीं हैं। चुनावी मुद्दे मुस्लिम आरक्षण, राज्य विभाजन, दलित, पिछड़ा या सवर्णवाद हैं। इसमें गलती नेताओं की नहीं है। जब समाज में नागरिकता बोध है ही नहीं, लोगों में भारतीयता का अहसास न्यूनतम है, तो नेता तो फूट डालकर शासन करेंगे ही। गणतंत्र दिवस पर क्या हम राष्ट्रवादी बनने का संकल्प लेंगे? यदि हां, तो सब ठीक हो जाएगा और यदि न, तो फिर ठगे जाते रहेंगे।

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