रविवार, 26 फ़रवरी 2012

एनसीटीसी का विरोध नहीं होना चाहिए


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

एनसीटीसी स्थापित करने का विचार उम्दा है। राज्यों को इसका विरोध नहीं करना चाहिए, ताकि आतंकवाद से लडऩे का रास्ता साफ हो।यदि केंद्र सरकार ने थोड़ी-सी दृढ़ता नहीं दिखाई, तो उसका आतंकवाद विरोधी राष्ट्रीय केंद्र (एनसीटीसी) स्थापित करने का सपना पूरा होना मुश्किल है। केंद्र सरकार ने प्रशासनिक आदेश जारी किया है कि एनसीटीसी की स्थापना एक मार्च को होगी और आगे की कहानी यह है कि तमाम राज्य सरकारों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। इसके विरोध की शुरुआत उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने की थी, फिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने उनके सुर में अपना सुर मिलाया और फिलहाल तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता से लेकर भाजपा शासित राज्यों के कुछ मुख्यमंत्री और जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला तक इसके विरोध में सामने आ गए। इधर, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की एक अहम सहयोगी तृणमूल कांग्रेस की नेता और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी एनसीटीसी के खिलाफ हैं। यानी, ममता बनर्जी ने अपनी ही सरकार का विरोध करने का यह मौका भी नहीं गंवाया, पिछले तमाम मौकों की तरह।
इन सभी मुख्यमंत्रियों की दलील तो सही है कि चूंकि कानून-व्यवस्था राज्यों का विषय है, इसलिए केंद्र सरकार को उनके इस विषय में दखल नहीं देना चाहिए। यदि वह दखल देती है, तो यह देश के संघीय ढांचे के खिलाफ होगा। मगर, यहां कुछ सवाल हैं, जिनका उत्तर ढूंढा जाना चाहिए। व्यवस्था का कोई ढांचा जनता के लिए होना चाहिए या फिर जनता को ढांचे के लिए? इसे दूसरे शब्दों में यूं कहा जा सकता है कि चूंकि जनता किसी भी ढांचे में फिट करने के लिए नहीं होती, इसलिए समय-समय पर जनता के हिसाब से व्यवस्था के ढांचे में परिवर्तन भी होते रहना चाहिए और इसी परिवर्तन का नाम लोकतंत्र है। यदि हम ढांचे को पकड़कर बैठ गए, तो आतंकवाद के इस दौर में गजब ही हो जाएगा।
देश में आतंकवाद फैलने के यूं तो कई कारण हैं, मगर उनमें एक प्रमुख कारण यह भी है कि राज्यों व केंद्र की जांच एजेंसियों में कोई आपसी तालमेल नहीं होता, इसलिए आतंकवादी घटनाओं की जांच में बहुत समय लगता है। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि आतंकी वारदात के वक्त राज्य की तमाम एजेंसियों में भी तालमेल नहीं रहता। 26/11 के मुंबई हमले में एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे समेत तीन पुलिस अफसरों की शहादत का कारण भी यही बताया गया था कि राज्य की तमाम एजेंसियों में तालमेल नहीं था। इस छेद को मूंदने का सही उपाय है, एनसीटीसी। अत: केंद्र सरकार दृढ़ता दिखाकर इस काम को आगे बढ़ाए।

उड़ीसा की पंचायतों में माओवादी घुसपैठ


उड़ीसा के पंचायत चुनावों में कई माओवादी निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं। चुनाव में भागीदारी के पीछे जरूर उनकी कोई रणनीति तो होगी।उड़ीसा से बहुत ही चौंकाने वाली खबर आई है। खबर यह है कि वहां जो त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव हुए हैं, उनमें या तो बड़ी तादाद में माओवादी स्वयं या फिर उनके समर्थक निर्विरोध पंच-सरपंचों के चुनाव जीते हैं। कुल मिलाकर आठ जिलों के तीस ब्लॉक ऐसे बताए जा रहे हैं, जहां की पंचायतों में माओवादी पंच -सरपंचों की अच्छी-खासी तादाद निर्विरोध निर्वाचित होकर जा पहुंची है। वैसे माओवादी लोकतंत्र की प्रक्रिया में यदि भागीदार बनते हैं, तो इसमें गलत कुछ भी नहीं है। मगर, उड़ीसा में उनकी यह जो भागीदारी सामने आई है, वह भागीदारी नहीं, बल्कि इसके पीछे उनकी कोई कुटिल रणनीति ही काम करती लगती है। उल्लेखनीय है कि मलकानगिरी और उससे सटे कोरापुट के साथ ही जिन आठ जिलों से यह खबर आई है, वहां माओवादियों ने पंचायत चुनावों के बहिष्कार का ऐलान कर रखा था। फिर, ऐसा क्या हुआ कि माओवादियों ने चुनावों के बहिष्कार का अपना फैसला बदला और वे जहां-तहां स्वयं चुनावी समर में कूद पड़े। इसके बाद हुआ यह भी कि उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों को डरा-धमकाकर बैठा दिया और इसका नतीजा यह निकला कि अधिकांश जगहों पर वे निर्विरोध निर्वाचित कर लिए गए।
क्या यह तथ्य यह जानने के लिए पर्याप्त नहीं है कि चुनावों में उतरना और जीतना उनकी किसी रणनीति का हिस्सा है? उनकी रणनीति होगी क्या? दरअसल, पिछले कुछ दिनों में माओवादियों के कई शीर्ष नेता मारे जा चुके हैं और उनकी आर्थिक दशा भी ठीक नहीं है। इधर, अब पंचायतों को अच्छा-खासा पैसा मिलने लगा है। तब संभव है कि वे इसी पैसे को लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए ही चुनाव में उतरे हों। वरना, इसका और क्या कारण हो सकता है कि पहले उन्होंने चुनाव का बहिष्कार किया और बाद में उसमें भागीदारी भी की?

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