बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

टाइम की आपत्ति को तवज्जो क्यों दें?




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

सुप्रीम कोर्ट ने टूजी स्पेक्ट्रम के सभी लाइसेंस रद्द कर दिए। अब अमेरिकी पत्रिका टाइम इस फैसले के खिलाफ माहौल बना रही है।


टूजी स्पेक्ट्रम के सभी 122 लाइसेंस सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द कर दिए जाने पर अमेरिका की विश्व-विख्यात पत्रिका टाइम को भारी आपत्ति है। उसको लगता है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद भारत में पूंजी निवेश करने वाले लोग हिचकेंगे, क्योंकि उन्हें पता चल गया है कि भारत में कानूनों का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता। बेगानी शादी में ये टाइम क्यों दीवानी हुई जा रही है? टूजी का आवंटन गैर-संवैधानिक था व उसमें भारी भ्रष्टाचार भी हुआ था, इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी लाइसेंस रद्द कर दिए। इसमें विदेशी निवेशकों के डरने की बात कहां से आ गई? टाइम की इस व्याख्या का मतलब कहीं यह तो नहीं है कि वह चाहती है कि भारत में देशी-विदेशी निवेशकों को भ्रष्टाचार करने की छूट भी मिलनी ही चाहिए? दुनिया में ऐसा कौन-सा देश है, जो निवेशकों को कानूनों का अतिक्रमण करने का अधिकार देता है? क्या उस अमेरिका में, जहां से टाइम प्रकाशित होती है, कोई भी निवेशक अमेरिकी कानूनों को नजरअंदाज कर सकता है? बिलकुल नहीं। तब टाइम यह क्यों चाहती है कि भारत में निवेश करने वालों को कानूनों से खिलवाड़ करने का अधिकार मिलना चाहिए?
दरअसल, टाइम वह पत्रिका है, जो दुनियाभर में पूंजीवाद का झंडा बुलंद करती है। लिहाजा, यह कुछ न कुछ ऐसा लिखती ही रहती है, जिससे भारत जैसे देशों में अमेरिका और यूरोप के हित पूरे हों और इन देशों की नजर हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर तो है ही। टाइम समझ गई है कि जैसे आज टूजी के लाइसेंस खारिज हुए, वैसे ही कल यदि किसी ने पहल कर दी, तो औने-पौने दामों में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मिले उत्खनन के लाइसेंस भी खारिज हो सकते हैं। इसीलिए उसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया है, पर हम टाइम की टें टें पर ध्यान न दें। देश को लूटने की इजाजत हम किसी को नहीं दे सकते।

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