गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

एस. रामानुजन के देश में गणितज्ञों की कमी


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाने की घोषणा कर दी गई है। यह अनूठा प्रयास है। क्या इससे गणित को बढ़ावा भी मिलेगा?प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की इस घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए कि वर्ष-2012 को राष्ट्रीय गणित वर्ष के रूप में मनाया जाएगा और इसके साथ ही हर वर्ष 22 दिसंबर को राष्ट्रीय गणित दिवस। दरअसल, 22 दिसंबर वह दिन है, जिस दिन वर्ष-1887 में महान गणितज्ञ एस. रामानुजन का जन्म हुआ था। इस दौर में ऐसे लोग बहुत कम होंगे, जो जानते होंगे कि रामानुजन ने आधुनिक गणित की रूपरेखा को निर्धारित करने का कार्य किया है। उन्होंने उस साम्राज्यवादी विचारधारा को अपनी प्रतिभा के बल पर करारा जवाब भी दिया, जो ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में यूरोप को श्रेष्ठ, तो भारत को हीन मानती थी। कुल मिलाकर एस. रामानुजन उस भारत के प्रतीक बनकर उभरे थे, जो 19वीं सदी में अपने पुराने गौरव को हासिल करने की जद्दोजहद में लगा था। अंत में ज्ञान के अभिमान से ठसाठस भरे पश्चिम ने भी रामानुजन की प्रतिभा का लोहा माना था और भारत की छवि तभी से बदली है। तब पश्चिम ने पहली बार माना था कि भारत में प्रतिभा है।

वरना तो यूरोपीय हमारी खिल्ली ही उड़ाया करते थे, हमें सपेरों और साधुओं का देश बता-बताकर। खैर...। याद करें, तो नोबेल पुरस्कार विजेता सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर एस. रामानुजन को अपना आदर्श मानते हैं। कई वैज्ञानिक और हैं, जो रामानुजन द्वारा दिए गए गणित के सूत्रों और प्रमेयों की दिल खोलकर प्रशंसा करते रहे हैं। इसलिए कि ये सब आज भी उपयोगी हैं और समय के साथ-साथ इनकी उपयोगिता और भी बढ़ती जा रही है। लिहाजा, कहा जा सकता है कि रामानुजन अब सिर्फ गणितज्ञ नहीं रहे, बल्कि वे गणित की एक अनूठी परंपरा बन गए हैं। मगर, इसे विडंबना ही कहें कि जिस देश में रामानुजन पैदा हुए थे, उसमें बेहतर गणितज्ञों की कमी अब एक समस्या बन चुकी है। हमारे प्रधानमंत्री ने भी इस तथ्य को स्वीकार किया है कि गणित की ओर से युवाओं का रुझान चिंताजनक स्तर तक कम होता चला जा रहा है।
इसका कारण क्या है? यही कि हमारी शिक्षा प्रणाली जिज्ञासा जगाने वाली नहीं है, बल्कि पूरा खेल अच्छे अंक पाने और बाद में अच्छी नौकरी पाने लायक बनने तक सिमटकर रह गया है। इस शिक्षा प्रणाली के भीतर रामानुजन जैसी प्रतिभाओं का उड़ान भरना संभव ही नहीं है। ऐसे में 'गणित दिवसÓ और 'गणित वर्षÓ का औचित्य तो है। कम से कम इस बहाने हम रामानुजन को याद तो करेंगे। हां, गणित की ओर युवाओं का रुझान बढ़ाने के लिए हमें कुछ और करना होगा। शिक्षा का ढांचा बदलना होगा।


आर्य संस्कृति पर अब भी हो रहे हैं शोध

आर्य भारत के मूल निवासी हैं या नहीं, इस पर तमाम शोध होते रहते हैं। एक ताजा वैज्ञानिक शोध में बताया गया है कि आर्य भारतीय ही हैं।
आर्य भारतीय हैं या फिर वे कहीं बाहर से भारत आए हैं? यह सवाल हमेशा दुनियाभर के जिज्ञासुओं को बेचैन करता रहा है। इसका कारण यह है कि आर्य सभ्यता के जो भी चिन्ह मौजूद हैं, वे साफ करते हैं कि आर्य बहुत बुद्धिमान व ज्ञानी-विज्ञानी कौम है। लिहाजा, आर्यों पर दार्शनिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक शोध भी खूब हुए हैं। एक ताजा शोध का निष्कर्ष यह है कि आर्यों के बाहर से भारत आने की कहानियां झूठी हैं। यह शोध किया है, हैदराबाद के सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी ने। इस शोध का आधार अनुवांशिकी (जेनेटिक्स) है। यानी, यह एक वैज्ञानिक शोध है। इसका निष्कर्ष है कि भारतीयों की कोशिकाओं का जो जेनेटिक ढांचा है, वह बहुत पुराना है, पांच हजार वर्ष से भी ज्यादा पुराना। तब यह कहानी अपने आप गलत साबित हो जाती है कि भारत के लोग साढ़े तीन हजार वर्ष पहले किसी दूसरे देश से आए थे। यदि आए होते, तो हमारा जेनेटिक ढांचा भी साढ़े तीन हजार वर्ष से ज्यादा पुराना नहीं होता, क्योंकि जब वातावरण बदलता है, तो हमारा जेनेटिक ढांचा भी बदल जाता है।
इसको एक उदाहरण से समझें। जैसे हमारे बीच का कोई व्यक्ति आज अमेरिका जाकर रहने लगे, तो वहां उसकी जो चौथी -पांचवी पीढ़ी होगी, सवा-डेढ़ सौ वर्ष बाद, उसका जेनेटिक ढांचा अमेरिकियों जैसा हो जाएगा, क्योंकि अमेरिका के वातावरण का उसकी अनुवांशिकी पर असर पड़ेगा। इन सब बातों का निचोड़ यही है कि जो इतिहासविद् कहते हैं कि आर्य बाहर से आए थे, उनके निष्कर्ष गलत हैं, क्योंकि उनके अनुसार आर्यों के भारत आने का समय साढ़े तीन हजार वर्ष पहले का है। दूसरे शब्दों में इसे यूं कहा जा सकता है कि आर्य अगर बाहर से आए भी थे, तो पांच हजार वर्ष पहले, साढ़े तीन हजार वर्ष पहले नहीं। देखना यह है कि इस शोध के नतीजों को स्वीकार किया जाता है या नहीं।

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