गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

आओ, देश की दशा पर विचार करें


राजेन्द्र चतुर्वेदी

वर्ष-2011 चला गया और 2012 आ गया। काल को मापने की मनुष्य ने जो इकाइयां विकसित की हैं, घंटा-मिनट, दिन आदि, दरअसल वर्ष इन्हीं का बड़ा रूप है। दशक, सदी और सहस्राब्दी समय को मापने के वर्ष से भी बड़े पैमाने हैं। अत: आज का दिन कुछ खास है। वैसे खास तो हर दिन होता है, मगर उनके लिए जो समय की कीमत जानते हैं। समय कितना कीमती है? जो क्षण गुजर गया, वो गुजर गया। लोग अपनी दौलत भी लुटा दें, तो भी गुजरे हुए समय का एक क्षण मात्र नहीं लौटा सकते। यही समय की शक्ति का प्रमाण है।

श्रीकृष्ण ने कहा है, कालंवशस्य भुवपार्थ:...। मतलब, हे अर्जुन, तू समय को अपने वश में करके चल। श्रीकृष्ण जब ऐसा कह रहे थे, तो वे अर्जुन को समय को मुट्ठी में बंद करने की शिक्षा नहीं दे रहे थे। वे केवल इतना कह रहे थे कि अर्जुन समय के साथ कदमताल कर। नहीं करेगा, तो तुझे पीछे छोड़कर समय आगे निकल जाएगा। फिर, इतनी कूबत किसी में नहीं कि वह समय को पकड़ सके। इससे यही सिद्ध होता है कि समय का एक-एक पल खास होता है। सूर्योदय या सूर्यास्त का समय अथवा हमारे द्वारा ही बनाया गया वह संक्रमण काल, जिसमें एक माह, वर्ष या दशक विदा होता है और दूसरा आ जाता है, उसको कुछ ज्यादा विशेष इसलिए माना जाता है कि वहां क्षणभर के लिए ठहरकर हम पीछे मुड़कर देखते हैं।
विश्लेषण करते हैं कि जो समय गुजर गया, वह हमने कहीं बर्बाद तो नहीं कर दिया। हम स्वागत नहीं करते, तो भी नया वर्ष आ ही जाता। हम विदा नहीं करते, तो भी पुराना वर्ष चला ही जाता। ऐसा संभव ही नहीं है कि हम विदा न करें, तो पुराना वर्ष अड़ जाएगा कि हम नहीं जाएंगे या नया वर्ष आने से इनकार कर देगा। बस, हमारे पूर्वजों ने नववर्ष जैसे प्रस्थान बिंदु इसीलिए रचे हैं, ताकि हम आत्मावलोकन कर सकें। विचार कर सकें कि जो नहीं पाया जा सका, वह क्यों? जो खो गया, क्या उसको खोने से रोका जा सकता था? वह कौन-से गलत निर्णय थे, जिनके कारण हम पीछे रह गए या वह कौन-से सही निर्णय थे, जिनके कारण हमने कुछ ज्यादा ही पा लिया?
मगर, वर्ष का प्रस्थान बिंदु जिस उद्देश्य से रचा गया है, हम लोगों में से अधिकतर वह तो पूरा करते नहीं। करते वह हैं, जो नहीं करना चाहिए। 31 दिसंबर को कितनी धूम थी, नए वर्ष के स्वागत की। जहां देखो, वहां जश्न का माहौल था। अब जश्न मनाने में जाता ही क्या है? थोड़े-से पैसे चाहिए, उन जगहों में प्रवेश के लिए, जहां जश्न मनाया जाना होता है। थिरकने लायक पैर और लचककर दूनी होने लायक कमर चाहिए होती है, डीजे या आर्केस्टा की धुनों पर मटकने के लिए। ईश्वर की कृपा से ये सब चीजें हमारे पास हैं। लिहाजा, जिन लोगों में पैसा खर्च करने की क्षमता थी, उन्होंने पैसा खर्च करके, तो जिन लोगों में यह क्षमता नहीं थी, उन्होंने दूसरे तरीकों से जश्न तो मनाया ही होगा, सिर्फ जश्न के लिए जश्न।
फिर भी, सावधान! इस जश्न में देश का एक-एक नागरिक शामिल नहीं हो पाया होगा। क्या वे बीस फीसदी लोग इसमें शामिल हो सके होंगे, जो राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की हाल की रिपोर्ट के मुताबिक ही अपने लिए दो जून की रोटी मुश्किल से जुटा पा रहे हैं? कौन जाने, उनमें से कितनों ने 31 दिसंबर की रात पेट में गांठ लगाकर बिताई होगी? उन किसानों की स्थिति पर नए वर्ष के जश्न से क्या फर्क पड़ा होगा, जिनके परिजन आत्महत्या कर चुके हैं? बताने की जरूरत नहीं है कि एक मोटा अनुमान यह है कि वर्ष-2011 में सरकार की पूंजीवादी नीतियों के कारण जान गंवाने वाले किसानों की तादाद तीस हजार के आसपास है। फिर, उन बच्चों की ओर भी देखो, जो कचरे के बजबजाते ढेरों पर बैठकर पन्नियां, कांच के टुकड़े, लोहा, बिजली के तार आदि बीनते हैं।
कचरे के ढेर में जब उनको रोटी का टुकड़ा मिलता है, तो उसको पाने के लिए वे वैसे ही आपस में झगडऩे लगते हैं, जैसे रोटी के टुकड़े के लिए सड़क पर घूमने वाले आवारा कुत्ते झगड़ते हैं। समाज की ऐसी वीभत्स सच्चाइयां देखने के लिए हमें किसी दूसरे लोक में नहीं जाना है। हम जिस शहर में रहते हैं, उसी में निकल पड़ें, तो ये हकीकतें आराम से दिख जाएंगी। इनको देखकर जिस इनसान को अपने इनसान होने पर शर्म न आए, वह कैसा इनसान? फिर, एक चक्कर उन सरकारी अस्पतालों का भी लगा आना, जहां के चीथड़ा हो गए बिस्तरों पर मानवता कराह रही होती है। ये वे मरीज होते हैं, जो अपनी पूरी गृहस्थी भी बेच दें, तो निजीकरण के इस दौर में विकसित हुए पांच सितारा निजी अस्पतालों की दहलीज भी नहीं चढ़ सकते। सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों पर यह आरोप खूब लगता है कि वे मरीजों को इनसान नहीं समझते, पर विचार इस पर भी तो करें कि जो लाखों का डोनेशन देकर डॉक्टर बना होगा, उसको जान-बूझकर अपनी मानवीय संवेदनाओं की हत्या करनी पड़ी होगी।
वह मरीजों को नहीं लूटेगा, दवा कंपनियों के एजेंटों से कमीशन लेकर उनको महंगी-महंगी दवाइयां नहीं लिखेगा, तो डॉक्टर बनने की जो कीमत उसने चुकाई है, वह कहां से वसूलेगा? घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खाएगा क्या? भारत में ऐसी ही बहुत-सी विसंगतियां और विद्रूपताएं फैली हुई हैं। यदि कबीर का नकारात्मक भाव में उल्लेख करने की इजाजत हो, तो कहा जा सकता है कि संत कबीर की यह साखी सही साबित हो जाएगी कि सब धरती कागज करूं, लेखन सब वनराय..., तो भी भारत की विद्रूपताओं के वर्णन के लिए जगह कम पड़ जाएगी। संत कबीर के अनुयाई इसके लिए क्षमा करेंगे। वैसे कबीरपंथी इस उल्लेख से नाराज नहीं होंगे, पर डर यह भी तो लगता है कि समाज आधुनिक से उत्तर आधुनिक जरूर होता जा रहा, फिर भी उसकी भावनाएं बहुत संवेदनशील हैं।
लिहाजा, क्या पता, किस बात पर किसकी भावनाएं कब भड़क उठें? नए साल के जश्न की तैयारियों को देखकर भी कुछ लोगों की मासूम भावनाएं आहत हो रही थीं और वे डंडा लेकर भारतीय संस्कृति की रक्षा करने पर आमादा हो उठे थे। ठीक वैसे ही, जैसे पाकिस्तानी संस्कृति की रक्षा तालिबान करने लगे हैं। खैर, इन सब विद्रूपताओं को उकेरने का मतलब यह कतई नहीं है कि जिन लोगों ने 31 दिसंबर की रात जश्न मनाया, उन्होंने कोई गुनाह कर दिया। हां, इतना मतलब तो है कि जश्न के खुमार में आत्मावलोकन करना यदि वे भूल गए, तो उनका जश्न व्यर्थ है। यहां फ्रायड का उल्लेख भी जरूरी है। उसने कहा था कि व्यक्तियों से समाज, तो समाज से व्यक्ति का निर्माण होता है। यानी, एक व्यक्ति के रूप में हमारी निजी उपलब्धियां कितनी भी जश्न मनाने लायक हों, पर हम समाज की एक इकाई हैं, सो अपने सामाजिक सराकारों से बच नहीं सकते। अत: आत्मावलोकन कर डालिए। आज साल का पहला दिन है। यानी, मौका अब भी बचा है।
ठ्ठ राजेन्द्र चतुर्वेदी

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