रविवार, 26 फ़रवरी 2012

बीमा प्रीमियम बढऩे के दिखने लगे आसार



- राजेन्द्र चतुर्वेदी


अप्रैल के महीने में स्वास्थ्य, वाहन और प्रॉपर्टी बीमा पर प्रीमियम बढ़ाया जा सकता है। इसके संकेत अभी से दिए जाने लगे, सरकार द्वारा।यदि आपने कर्ज लेकर मकान खरीदा होगा, तो पिछले एक-सवा साल में आपकी मासिक किस्त (ईएमआई) में ब्याज दरें बढ़ जाने के कारण पांच से छह फीसदी का इजाफा हो चुका होगा। इधर, पिछले पांच-छह वर्ष में निवेश का जरिया बनने के कारण प्रॉपर्टी (जमीन, मकान आदि) की कीमतें तीन सौ फीसदी तक बढ़ ही चुकी हैं। यही हाल खाने-पीने की वस्तुओं की महंगाई का भी है, मगर अब सावधान हो जाइए। अप्रैल के महीने से हम सभी को अपने स्वास्थ्य, वाहन और प्रॉपर्टी के बीमा पर ज्यादा प्रीमियम भी चुकाना पड़ सकता है। दरअसल, केंद्रीय वित्त मंत्रालय ने जनरल इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (जीआईसी) से साफ-साफ कह दिया है कि वह घाटे वाले बीमा का भुगतान अब बंद करे।
जीआईसी देश की वह एकमात्र संस्था है, जिसके पास बीमा के कारोबार से जुड़ी कंपनियों को अपना स्वयं का बीमा कराना होता है। जिस प्रकार हम अपने क्लेम के लिए अपनी बीमा कंपनी के पास जाते हैं, उसी प्रकार बीमा कंपनियां अपने क्लेम के लिए जीआईसी के पास जाती हैं। वित्त मंत्रालय के निर्देश के बाद अब जीआईसी घाटे वाले बीमा के लिए बीमा कंपनियों के क्लेम का भुगतान नहीं करेगी। तब बीमा कंपनियों के पास रास्ता यही बचता है कि वे स्वास्थ्य, वाहन और प्रॉपर्टी के बीमा का प्रीमियम बढ़ाएं और इनको स्वयं के लिए घाटे का सौदा नहीं रहने दें। यह तीनों बीमा, बीमा कंपनियों के लिए सबसे ज्यादा जोखिम वाले होते हैं। स्वास्थ्य बीमा से जुड़ी कंपनियां आए दिन कहती ही रहती हैं कि अभी देशभर से वे जितना भी प्रीमियम जुटाती हैं, वह पूरा का पूरा क्लेम का भुगतान करने में खर्च हो जाता है, बल्कि कंपनियों को घाटा भी उठाना पड़ता है, क्योंकि इसका सही आंकड़ा यह है कि प्रीमियम के जरिए मिले हर सौ रुपए पर फिलहाल तो क्लेम के भुगतान में बीमा कंपनियों के 103 रुपए खर्च हो रहे हैं।
जाहिर है कि यह जोखिम बीमा कंपनियां स्वयं बर्दाश्त नहीं करेंगी, क्योंकि ये समाजसेवा के लिए बीमा कारोबार में नहीं आई हैं, बल्कि इनका लक्ष्य मुनाफा कमाना है। जीआईसी इनकी मदद करेगी नहीं, तो फिर बचता कौन है? इस देश में जनता (बीमा के संदर्भ में उपभोक्ता) की खोपड़ी ही इस्पात की मानी जाती है कि उस पर कितना भी वजनदार हथौड़ा चला दो। लिहाजा, अबकी बार बीमा प्रीमियम का हथौड़ा चलने वाला है। चूंकि हमारे देश में उपभोक्ताओं को भरोसे में लेकर कुछ करने की परंपरा भी नहीं है, इसलिए बीमा प्रीमियम भी चुपके से बढ़ा दिया जाएगा।

विवादों में राहुल गांधी और उनका रोड शो

संभव है कि कानपुर प्रशासन ने मायावती के इशारे पर ही राहुल के खिलाफ एफआईआर दर्ज की हो, पर राहुल गांधी की गलती तो है।अब कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी पर चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन का आरोप लगा है व उनके खिलाफ कानपुर में भारतीय दंड संहिता की धारा-283 और 290 के साथ ही साथ निषेधाज्ञा के उल्लंघन का मामला दर्ज किया गया है, जिसके खिलाफ कांग्रेस ने हाईकोर्ट जाने की तैयारी भी कर ली है, जोकि उसका संवैधानिक अधिकार है। मगर, फिलहाल तो राहुल गांधी विवादों में हैं। मसला यह है कि राहुल गांधी ने सोमवार को कानपुर में अपना रोड शो किया था, लेकिन जिस मार्ग पर यह शो करने की अनुमति प्रशासन से ली गई थी, रोड शो उस पर नहीं किया गया, बल्कि दूसरे मार्ग पर किया गया। इतना ही नहीं, हुआ यह भी कि प्रशासन से अनुमति ली गई थी, कुल 18 किलोमीटर रोड शो करने की, पर जब यह शो शुरू हुआ, तो पूरे 35 किलो-मीटर तक होता चला गया। इसको कानपुर प्रशासन ने निषेधाज्ञा, धारा-144 और चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन माना और राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई।
इस मामले में कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि कानपुर के जिला प्रशासन ने जो भी किया है, वह उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के इशारे पर ही किया गया है। इस आरोप में दम तो है, क्योंकि हमारे राजनीतिज्ञ अपने विरोधियों को बख्शते भी कब हैं? यह इसलिए कि यहां वैचारिक मतभेद सत्ता की लड़ाई में तब्दील हो चुके हैं। तब संभव है कि मायावती ने कानपुर प्रशासन से राहुल गांधी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करा दिया हो। मगर, कांग्रेस को इस पचड़े में पडऩा ही नहीं चाहिए कि मुकदमा किसके इशारे पर दर्ज हुआ? बल्कि उसे इसका जवाब देना चाहिए कि राहुल गांधी ने जो गलती की, वह क्यों की? क्या चुनाव आचार संहिता को ठेंगा दिखाने के लिए? जाहिर है कि इन सवालों के कांग्रेस के पास कोई जवाब नहीं हैं। अत: वह यहां-वहां की बातें कर रही है।

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