गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

लड़कियों को दोयम तो मानता है अपना समाज




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

संयुक्त राष्ट्र संघ की एक रिपोर्ट में भारत को लड़कियों के लिए सबसे ज्यादा असुरक्षित देश बताया गया है। क्या यह रिपोर्ट सच्ची नहीं?

संयुक्त राष्ट्र संघ के सामाजिक व आर्थिक मामलों के विभाग द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत लड़कियों के लिए सब देशों से ज्यादा असुरक्षित देश है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि हमारे देश में एक से पांच वर्ष की 75 फीसदी बच्चियों की मौत हो जाती है और यहां लड़कों के मुकाबले लड़कियों की मृत्युदर बहुत ज्यादा है तथा इसमें इजाफा 1970 के बाद हुआ है। खैर, इस रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसको झुठलाया जा सकता हो। यह तथ्य दीवार पर लिखी इबारत के समान कोई भी पढ़ सकता है कि भारतीय समाज में लड़के और लड़कियों के बीच भारी पक्षपात होता है। इस मामले में भारतीय समाज पाखंडी भी बहुत है। वह नारियों को पूजनीय मानता है, कन्याओं में देवी मैया के दर्शन करता है, उनके पैर धोकर चरणोदक पीता है, पर परिवार में अव्वल तो बेटियों को जन्म ही नहीं लेने देना चाहता, फिर बेटी ने जन्म भी ले लिया, तो उसके साथ दोहरा रवैया अपनाएगा। बेटे को उम्दा जीवन स्तर मुहैया कराने की कोशिश करेगा, तो बेटियों को दोयम दर्जे का जीवन स्तर और यह सिर्फ अनपढ़ और गरीब लोग ही नहीं करते, बल्कि शिक्षित और धनी समाज में यह सब अनपढ़ और गरीबों के मुकाबले कहीं बहुत ज्यादा होता है।



एक से पांच वर्ष की यदि 75 फीसदी बेटियां मर जाती हैं, तो जाहिर है कि वे परिवार के दोहरे रवैए के कारण ही मरती होंगी, न कि कुपोषण के कारण। दरअसल, कुपोषण एक बीमारी है, जो सिर्फ बेटियों को ही नहीं होती, वो बेटों को भी होती होगी, क्योंकि बीमारियां पक्षपात करना नहीं जानतीं। पक्षपात करना तो केवल इंसान जानते हैं। अत: इस रिपोर्ट को झुठलाने की जगह जरूरत इस बात की है कि अपनी आंखें खोल ली जाएं और मान लिया जाए कि हम बेटियों की उपेक्षा करते हैं। संभव है कि गलती को मान लेने के बाद उसको सुधारने की प्रेरणा भी मिले।

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