मंगलवार, 27 मार्च 2012

आखिर, इन दलों पर कौन विश्वास करेगा?


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

एनसीटीसी के गठन का रास्ता साफ होना एक अच्छी खबर है, मगर बुरी खबर यह है कि तीन दलों ने बेपेंदी के लोटा की भूमिका निभाई है।

डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार ने एनसीटीसी (राष्ट्रीय आतंक विरोधी केंद्र) की जंग राज्यसभा में भी जीत ही ली। इसमें कुछ गलत भी नहीं है, क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए एक ऐसा संस्थान बनना ही चाहिए, जो प्रभावशाली हो। यह सही है कि अपने देश की व्यवस्था का ढांचा संघीय है, मगर सच यह भी है कि कोई भी ढांचा देश के लिए होना चाहिए, देश ढांचे के लिए नहीं। जब देश ही नहीं रहेगा, तो ढांचा किस काम का? मतलब, एनसीटीसी जरूरी है। केंद्र का राज्यों में दखल बढ़ जाएगा, जैसे तर्कों के आधार पर एनसीटीसी के गठन को रोकना अनुचित है और जब सरकार राज्यसभा में भी यह जंग जीत गई, तो माना जाना चाहिए कि एनसीटीसी के गठन का रास्ता भी जल्द बनेगा, मगर राज्यसभा में जो हुआ, हमारी उस पर भी नजर होनी चाहिए। एक बार फिर स्पष्ट कर दें कि एनसीटीसी का गठन जरूरी है, पर यह सही नहीं कि कुछ दलों ने अचानक अपना पैंतरा बदल लिया। इससे राजनीति की विश्वसनीयता पर आंच आती है।
मसलन-ममता बनर्जी अपनी ही केंद्र सरकार के लगभग हर निर्णय पर जैसा ड्रामा करती हैं, वैसा ही ड्रामा वे एनसीटीसी वाले मुद्दे पर भी कर रही थीं। एनसीटीसी के खिलाफ जितनी बातें ममता ने कहीं, उतनी बातें तो संसद में संशोधन प्रस्ताव लेकर आए भाजपा और वामदलों ने भी नहीं कहीं थीं, पर इन प्रस्तावों पर राज्यसभा में ज्यों ही मतदान की नौबत आई, ममता की पार्टी के सांसद भाग खड़े हुए। ममता सचमुच एनसीटीसी के विरोध में यदि थीं, तो उनको भाजपा-वामदलों के प्रस्ताव के पक्ष में अपने सांसदों से मतदान कराना चाहिए था। चूंकि किसी भी विषय पर मतदान के वक्त सदन का बहिष्कार करने से सरकार ही मजबूत होती है। अत: ममता के सांसदों का मतदान में भाग न लेने का अर्थ यही है कि ममता एनसीटीसी का विरोध केवल दिखाने के लिए ही कर रही थीं। तब उन पर भरोसा भी कौन करेगा?
ऐसा ही चमत्कार मुलायम सिंह यादव और मायावती के दलों ने भी कर दिखाया। इनके सांसदों ने तो एनसीटीसी के पक्ष और भाजपा तथा वामदलों के संशोधन प्रस्ताव के खिलाफ मतदान तक किया। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। मगर, सवाल यह है कि जब आप एनसीटीसी के पक्ष में थे, तो उसके खिलाफ बयानबाजी क्यों की? मुलायम सिंह और मायावती छाती ठोककर कहते कि वे एनसीटीसी के पक्ष में हैं, तो इससे उनकी विश्वसनीयता प्रमाणित होती। मगर, ये सब तो बेपेंदी के लोटा साबित हुए।


क्योंकि, उनकी कार रेल से कभी नहीं टकराती

देश में दो हजार से ज्यादा रेल चौकियां अंग्रेजों के जमाने से मानवविहीन हैं। इन पर आए दिन हादसे होते रहते हैं, पर हुक्मरान सोते रहते हैं।

देश के नए रेल मंत्री मुकुल रॉय की पारी की शुरुआत ही दो रेल हादसों के साथ हुई है और ये दोनों ही हादसे मानवरहित रेल चौकियों पर हुए हैं। यूपी के हाथरस जिले के मेडू स्टेशन के पास पहला हादसा हुआ, जहां मथुरा-कासगंज पैसेंजर ने टाटा मैजिक के परखच्चे उड़ा दिए, तो दूसरा हादसा भी उत्तरप्रदेश में ही हुआ, जहां लखनऊ के पास एक मानवरहित क्रासिंग पर ट्रेन की चपेट में एक ट्रक आ गया। ताजा स्थिति यह है कि इन दोनों हादसों में 17 लोग मर चुके हैं, रेल मंत्री व उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री मृतकों को श्रद्धांजलि दे चुके हैं और ऐलान कर चुके हैं कि मृतकों के परिजनों को मुआवजा दिया जाएगा। दरअसल, हमारे हुक्मरानों के लिए किसी व्यक्ति की मौत एक जिंदगी का खात्मा नहीं होती और न ही उनमें इतनी संवेदना होती है कि वे यह समझ सकें कि मृतक अपने पीछे जिन लोगों को छोड़ गया, उनका क्या होगा? हुक्मरानों के लिए हर मौत एक आंकड़ा होती है। ऐसा आंकड़ा, जिस पर मुआवजा देकर पर्दा डाला जा सकता है। इधर, रेलवे तो उनके लिए कोई संस्था रही ही नहीं, बल्कि एक ऐसा माध्यम बन गई है, जिसके मार्फत वे अपने राजनीतिक उल्लू सीधे करते हैं और जब वे यह करते हैं, तब शर्मोहया को ताक में रख देते हैं। तभी, रेल हादसों के बाद उन्हें शर्म भी बिलकुल नहीं आती।
पूरे देश में दो हजार से ज्यादा रेल चौकियां अंग्रजों के जमाने से ही मानवविहीन हैं। क्या यह तथ्य अपने आप में शर्मनाक नहीं है और इससे भी ज्यादा लज्जा की बात यह है कि इन चौकियों पर कर्मचारियों की तैनाती के केवल भाषण ही दिए जाते हैं। लालू प्रसाद यादव अपने जमाने में, तो ममता बनर्जी अपने जमाने में इन चौकियों पर कर्मचारी नियुक्त करने की ढींगें हांकते रहे हैं, पर हुआ कुछ नहीं। अब भी कुछ होने की उम्मीद नहीं हैं, क्योंकि हुक्मरानों की कारें रेलगाडिय़ों से कभी नहीं टकरातीं।

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