सोमवार, 5 मार्च 2012

सड़क दुर्घटनाएं रोकने का एक उम्दा प्रयास


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मोटर वाहन कानून में संशोधनों को मंजूरी दे दी है। इसमें पेच तो हैं, फिर भी इस प्रयास का स्वागत होना चाहिए।

पूरी दुनिया के सिर्फ एक फीसदी वाहन भारत में हैं, जबकि पूरी दुनिया के मुकाबले हमारे देश में सड़क दुर्घटनाएं होती हैं, दस फीसदी। यानी, हमारा देश सड़क दुर्घटनाओं के मामले में अव्वल है। तब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने यदि मोटर वाहन कानून-1988 में संशोधनों को हरी झंडी दे दी है, तो इसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। उम्मीद यह की जानी चाहिए कि इन संशोधनों के कानून में तब्दील होते ही सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएगी। अलबत्ता, यह आशंका भी अपनी जगह बरकरार है कि आखिर इस कानून पर अमल होगा भी, तो कैसे? मसलन-इस कानून के पांच मुख्य बिंदु हैं-वाहन चलाते समय मोबाइल पर बात करना और बिना हेलमेट के वाहन चलाना, तेज रफ्तार से वाहन चलाना, खतरनाक ढंग से वाहन चलाना, नशे की हालत में वाहन चलाना और चौराहे की लालबत्ती का उल्लंघन करना। इन सब गतिविधियों में सजा व जुर्माने में इजाफा करने की तैयारी कर ली है, सरकार ने।
यह गलत नहीं है, पर कुछ पेच ऐसे हैं, जो इस कानून को कुंद कर देंगे। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति नशे की अवस्था में वाहन चलाता पकड़ा जाता है, तब उससे पांच सौ रुपए जुर्माना वसूला जाएगा। वही व्यक्ति जब दुबारा नशे की अवस्था में वाहन चलाता पकड़ा जाएगा, तो उससे दो से लेकर पांच हजार रुपए का जुर्माना वसूला जाएगा। जुर्माने की धनराशि आरोपी वाहन चालक की चिकित्सकीय जांच के बाद तय होगी, उसके खून में मौजूद मादक-द्रव (एल्कोहल) की मात्रा के आधार पर। यह सब सही है, पर सवाल यह है कि वही व्यक्ति जब तीसरी बार नशे की हालत में वाहन चलाता पकड़ा जाएगा, तो फिर क्या होगा? इस सवाल पर तो कानून ऐसे मौन है, मानो दो बार गलती करने के बाद हर अपराधी सुधर ही जाएगा। वह फिर गलती करेगा ही नहीं।
अभी एक पेच और है। जिस व्यक्ति को यातायात पुलिस या परिवहन विभाग नशे की हालत में वाहन चलाते हुए पकड़ेगा, तो पकडऩे वाले को पकड़े गए व्यक्ति के संबंध में यह पता कैसे चलेगा कि वह पहली बार पकड़ा गया है या दूसरी-तीसरी बार? क्या पकडऩे वालों के पास हर वाहन चालक के बारे में पूरी की पूरी जानकारी होगी, जिसे देखकर उन्हें पता चल जाए कि पकड़ में आया व्यक्ति कितनी बार पकड़ा जा चुका है? इन व इन जैसे कई सवाल हैं, जिन पर केंद्र सरकार के नए संशोधन मौन हैं, तो भी इसका स्वागत किया जाना चाहिए। कम से कम उसने वाहन दुर्घटनाओं को रोकने का कोई प्रयास तो किया।

आरोप तय होने में लग गए करीब दो दशक


चारा घोटाला मामले में लालू प्रसाद यादव समेत चार लोगों के खिलाफ गुरुवार को आरोप तय हुए हैं। देश में यूं लड़ा जा रहा है, भ्रष्टाचार से।
देश में टूजी स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेल जैसे घोटाले जब हो चुके हैं, तो संभव है कि कुछ लोगों की स्मृति से चारा घोटाला गायब ही हो गया हो। जी हां, हम उसी चारा घोटाले की बात कर रहे हैं, जो बिहार में वर्ष-1994 से 1996 के बीच हुआ था और जिसके कारण बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को जेल जाना पड़ा था, अपनी पत्नी रावड़ी देवी को बिहार की गद्दी सौंपकर। करीब 17-18 वर्ष बाद गुरुवार को इस मामले में सीबीआई की एक विशेष अदालत ने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ आरोप तय कर दिए हैं। 46 लाख रुपए के इस घोटाले में लालू के साथ-साथ एक और भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र समेत एक पूर्व तथा एक वर्तमान सांसद के खिलाफ भी आरोप तय हो गए हैं। सवाल यह है कि जब आरोप तय होने में ही करीब दो दशक का समय बीत गया है, तब मुकदमा चलने और फैसला आने में कितना वक्त लगेगा? यह तो सही है कि चारा घोटाले के बाद देश में जो भी घोटाले हुए हैं, उनके सामने 46 लाख के इस घोटाले की कोई हैसियत नहीं है, मगर 17-18 वर्ष बाद तय हुए आरोप यह तो बताते ही हैं कि देश में ताकतवर लोगों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच की गति कितनी धीमी है?
भ्रष्टाचार के आरोपियों को इसीलिए तो सजा का भी डर नहीं लगता कि जब तक उनकी करतूतों पर अंतिम अदालती फैसला आएगा, तब तक उनकी उम्र बीत चुकी होगी। यहां देश को इस सवाल का जवाब भी मिल गया होगा कि लालू प्रसाद लोकपाल जैसे किसी कानून के सबसे ज्यादा खिलाफ क्यों हैं? क्यों उन्हें लगता है कि अगर लोकपाल बन गया, तो पुलिस का एक दरोगा भी नेताओं को जेल में डाल देगा? कुल मिलाकर, सरकार को चाहिए कि वह भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित सुनवाई की कारगर व्यवस्था करे, तो जनता भी सिर्फ तमाशा ही न देखती रहे।

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