सोमवार, 5 मार्च 2012

मेहनत करके अर्जित की लोकप्रियता




मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंहजी चौहान का जन्मदिन


वराज सिंह चौहान के आने की खबर से हजारों लोग इकट्ठे हो जाते हैं। किसी को लाना नहीं पड़ता, स्वयमेव पहुंचते हैं। देखने में आता है कि इनमें युवा चेहरे सर्वाधिक होते हैं। बेटियों, महिलाओं और युवा चेहरों की विशेष उपस्थिति उल्लेखनीय होती है। ऐसी लोकप्रियता के लिए कठिन परिश्रम, साधना, दृढ़- इच्छाशक्ति और संकल्प की जरूरत होती है। इसके साथ ही एक और बड़ी आवश्यकता होती है, अपनी बात को अभिव्यक्त करने की क्षमता। ईश्वर ने शिवराज सिंह को इन सभी गुणों से एक साथ नवाजा है।
आखिर क्या आकर्षण है, शिवराज में? यह प्रश्न जितना सहज है, उत्तर भी उतना ही सरल। शिवराज सिंह प्रदेश के ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जो बिलकुल सरल, सहज और मिलनसार हैं। उनमें पद का घमंड किसी ने कभी नहीं देखा होगा। हर कोई उनसे मिल लेता है, बल्कि यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि वे खुद ही जाकर हर किसी से मिल लेते हैं। इसमें सबसे बड़ी बात यह कि वे पंक्ति में खड़े सबसे आखिरी व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश ही नहीं करते, सप्रयास उसके समीप पहुंचते भी हैं।
लगता है कि हर किसी की पीड़ा उनकी अपनी है। इस पीड़ा को वे हर लेना चाहते हैं। कठिन परिश्रम में उनका कोई सानी नहीं है। आश्चर्य होता है, यह देखकर कि वे प्रतिदिन 18-20 घंटे लगातार कार्य कर लेते हैं। ग्रामों में जब वे होते हैं, भोर से लेकर शुरू हुआ उनका जन-दर्शन आधी रात हो जाने के बाद भी चलता रहता है। वनवासी सम्मान के लिए निकले शिवराज सिंह कभी थकते नहीं दिखते। विभागों की समीक्षा का दौर और प्रशासनिक कार्य भी वे ऐसे ही लगातार करते हैं। उन्होंने एक आम कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री तक का सफर इसी परिश्रम से तय किया है। उनकी यात्रा अब भी जारी है। आगे का मार्ग भी वे अपनी इसी अद्भुत कर्मठता से तय करेंगे।
लक्ष्य प्राप्ति के लिए परम आवश्यक गुण है, साधना और शिवराज की यह साधना स्तुत्य है। इसी का प्रतिफल है कि दर्शनशास्त्र जैसे गूढ़ विषय में उन्होंने स्वर्ण पदक अर्जित किया। वे सतत अध्ययनशील हैं। सामान्यत: किसी भी विषय पर वे बिना अध्ययन के नहीं बोलते। जब भी बोलते हैं, पूरे अधिकार के साथ, विषय पारंगत होकर। सबने देखा है, हिंदू धर्म के विविध आयामों पर उन्हें बोलते हुए। गीता तो मानो कंठस्थ-सी लगती है। जब वे सामयिक विषयों पर बोल रहे होते हैं, उनके मुख से कबीर और संत रविदास, महात्मा ज्योतिबा फुले की वाणी झरने के शुद्ध जल की तरह प्रवाहित होते देखी है। प्रकाश पर्व पर गुरु ग्रंथ साहब, पर्यूषण पर्व के क्षमायाचना अवसर पर जैन धर्म का उल्लेख, इस्लाम और ईसाई धर्मों के त्यौहारों पर शिवराज का धार्मिक संवाद सुनकर बहुत-से लोगों को अवाक होते देखा गया है। वे अपने शासकीय निवास पर इन सभी पर्वों को बड़े हर्ष व उल्लास के साथ मनाने वाले देश के शायद पहले मुख्यमंत्री हैं।
उन्होंने अपने जीवन में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के दर्शन को अपनाया है। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने जितनी भी योजनाएं बनाईं, सभी में पं. दीनदयाल उपाध्याय की प्रेरणा दिखाई देती है। वे दीन भगवान को मानकर उनकी सेवा का संकल्प लिए कार्य करते हैं। पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति और समाज के सबसे कमजोर वर्ग का सबसे पहले कल्याण उनका लक्ष्य होता है। दृढ़-इच्छाशक्ति के साथ संकल्पबद्ध होकर कार्य करना शिवराज सिंह की विशेषता है। इसी विशेषता से उन्होंने मध्यप्रदेश में बेटियों को बोझ से वरदान बना दिया है। आज मध्यप्रदेश में बेटियां अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रही हैं। शिवराज सिंह चौहान का 'बेटी बचाओ अभियानÓ प्रदेश में जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। बेटियों की घटती संख्या राष्ट्रीय चिंता की विषय है। मध्यप्रदेश में उनके द्वारा प्रारंभ इस अभियान से वे देश में बेटी बचाओ आंदोलन के प्रणेता बन गए हैं।
मध्यप्रदेश के जैत गांव के किसान परिवार में पांच मार्च-1959 को जन्मे शिवराज सिंह चौहान बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के धनी हैं। नेतृत्व क्षमता उनमें बचपन से है। छोटी कक्षा में मानीटर बनने से लेकर मॉडल हायर सेकेंडरी स्कूल के छात्र संघ अध्यक्ष बनने तक उन्होंने छात्र जीवन में नेतृत्व का पाठ सीखा। वे अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के विभिन्न पदों पर रहे। भारतीय जनता पार्टी के युवा मोर्चा के अनेक पदों से लेकर अध्यक्ष तक का पदभार उन्होंने संभाला। वे भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे। सन 1990 में पहली बार बुदनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। इसके बाद 1991 में विदिशा संसदीय क्षेत्र से पहली बार सांसद बने। उनकी नेतृत्व क्षमता, मिलन सारिता, सरल व्यक्तित्व और सर्वसुलभता का परिणाम था कि वे पांच बार चुनाव में विजयी होकर संसद सदस्य रहे। नेतृत्व क्षमता को ही पहचानकर भारतीय जनता पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की योग्यता देखी।
वे 29 नवंबर-2005 को पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। पार्टी द्वारा मुख्यमंत्री बनाए जाने के निर्णय में वे एक सफलतम व्यक्ति साबित हुए। वर्ष-2008 में प्रदेश विधानसभा का चुनाव मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में लड़ा गया। इसमें भाजपा ने पुन: ऐतिहासिक जीत दर्ज की। परिणामस्वरूप उन्होंने 12 दिसंबर-2008 को मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की दोबारा शपथ ली। इस विजय ने साबित कर दिया कि शिवराज सिंह चौहान सही अर्थों में जन-नेता हैं। उन पर आमजन का अटूट विश्वास है। शिवराज ने भी इस विश्वास को कभी खंडित नहीं होने दिया। उन्होंने प्रदेश में प्राय: सभी वर्गों की पंचायतें बुलाने का सिलसिला प्रारंभ किया।
महिलाओं, कोटवारों, घरेलू कामकाजी बहनों से लेकर विद्यार्थियों और हाल ही में हुई फेरीवालों व मछुआ पंचायत तक सबसे चर्चा कर व्यावहारिक निर्णय लिए। प्रदेश में अन्त्योदय योजनाएं बनीं। प्रत्येक प्रदेशवासी का अपना घर और हर गांव को सड़क से जोडऩे की योजनाओं का क्रियान्वयन शुरू हुआ। केंद्र सरकार से योजनाओं में सहयोग का वे आग्रह अवश्य करते हैं, पर देखने में आया कि वे कभी उसके भरोसे नहीं बैठे। भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने के लिए विशेष न्यायालय अधिनियम पारित कराने का उन्होंने साहसिक निर्णय लिया, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे।
ऐसा ही साहस भरा निर्णय लोक सेवा गारंटी कानून बनाने का है। निर्धारित समय में कार्य न होने पर सरकारी कर्मचारी से जुर्माना वसूल कर आवेदक को देने का प्रावधान है, इस कानून में। शिवराज प्रभावशाली वक्ता हैं। उनकी बात का जादुई असर होता है। सरल स्वभाव से वे सबको अपना बना लेते हैं। राजनीति में उनकी सौजन्यता से विरोधी भी कायल हैं। वे राजनीति को सेवा का माध्यम और धर्म मानते हैं। उन्होंने अपने पुरुषार्थ, कर्मठता और सहजता से राजनीति को नई शैली दी है।

- गौतम

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