मंगलवार, 27 मार्च 2012

मानवाधिकार हनन का अपराधी है श्रीलंका


- राजेन्द्र चतुर्वेदी

अंतरराष्ट्रीय परिषद में भारत ने श्रीलंका के खिलाफ मतदान किया। यह एक उम्दा निर्णय है, क्योंकि श्रीलंका मानवाधिकार हनन का दोषी है।


अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार परिषद में भारत ने श्रीलंका के खिलाफ मतदान कर दिया है। इसमें तो कोई संदेह नहीं कि भारत सरकार ने यह मतदान अपने समर्थक दल डीएमके के दबाव में ही किया है, पर उसका यह निर्णय गलत नहीं है। भारत अमेरिका का पिछलग्गू बन गया है, उसने श्रीलंका जैसे दोस्त से दुश्मनी मोल ले ली है, उसने गुट निरपेक्ष आंदोलन को चोट पहुंचा दी है, जैसी बातें कर-करके छाती तो खूब कूटी जा सकती है, पर आज की दुनिया में इन बातों में कोई दम नहीं। सच यह है कि भारत अमेरिका का पिछलग्गू डेढ़ दशक पहले बन चुका था और इसमें कुछ गलत भी नहीं है। एकलध्रुवीय दुनिया में भारत के हित कुल मिलाकर अमेरिका के साथ ही निहित हैं। यह सही है कि अमेरिका अब भी हमें यदा-कदा धोखा दे देता है, मगर इसकी वजह यह है कि भारत लंबे समय तक विघटित हो चुके सोवियत संघ के खेमे में रहा था। अत: अमेरिका अभी हम पर कम भरोसा करता है।
यह कोई समस्या भी नहीं है। जैसे-जैसे नजदीकियां बढ़ती जाएंगी, गलतफहमियां भी दूर होती जाएंगी। रही बात भारत और श्रीलंका की दोस्ती की, तो दोस्ती निभाने का ठेका सिर्फ भारत ने नहीं ले लिया है। कहा कुछ भी जाए, पर हकीकत यही है कि यह पड़ौसी हमसे दूर हो गया है। ताजा स्थिति यह है कि वह भारत की लाख कोशिशों के बावजूद चीन की गोद में जा बैठा है। मतलब, उसने दोस्ती निभाई नहीं, तो हम भी क्यों निभाएं? यही स्थिति गुट निरपेक्ष आंदोलन की भी है। कभी दुनिया दो गुटों में बंटी हुई थी, अमेरिका और सोवियत संघ के गुटों में। तब गुट निरपेक्ष आंदोलन की प्रासंगिकता भी थी। इस समय दुनिया में जब गुट ही नहीं बचे हैं, तब गुट निरपेक्षता का क्या मतलब? यहां एक बात और ध्यान देने योग्य है। उस जमाने में भारत कहने को तो था, गुट निरपेक्ष, मगर वास्तव में वह सोवियत संघ के खेमे में था। अत: अब उन पुरानी यादों को ताजा करने का कोई मतलब है ही नहीं।
लिहाजा, भारत ने श्रीलंका के खिलााफ जो मतदान किया है, वह बिलकुल सही है। एलटीटीई से संघर्ष के दौरान श्रीलंका की फौज ने निर्दोष तमिलों के साथ जो क्रूरता की है, उसको इसकी सजा मिलनी ही चाहिए। क्या यह शर्मनाक नहीं है कि श्रीलंका में आज भी तमिल दोयम नागरिक हैं? तब उनके हितों की बात यदि भारत नहीं करेगा, तो कौन करेगा? सरकार ने यही किया है। इस पर जो तथाकथित प्रगतिशील रो रहे हैं, उनकी परवाह करने की जरूरत नहीं है। सरकार अपने निर्णय पर दृढ़ रहे।

विपक्ष का रवैया गलत नहीं माना जा सकता

लोकपाल पर हुई सर्वदलीय बैठक में कोई नतीजा नहीं निकल सका। जब केंद्र सरकार अपनी जिद छोडऩे को तैयार ही नहीं, तो यह तो होना ही था।


जो संदेह था, वह सच साबित हुआ। लोकपाल पर आमराय बनाने के लिए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शुक्रवार को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, मगर उस बैठक में कोई नतीजा नहीं निकल सका। दरअसल, सरकार वही लोकपाल विधेयक राज्य-सभा में भी पास कराना चाहती है, जोकि वह लोकसभा में करा चुकी है, जबकि विपक्ष उसमें संशोधन चाहता है। विपक्ष के सभी प्रमुख दल लगभग तीन मुद्दों पर एकमत हैं। एक-सीबीआई को लोकपाल के दायरे में लाया जाए। दो-लोकपाल को हटाने का अधिकार सरकार के पास नहीं, बल्कि संसद के पास होना चाहिए और तीन-लोकपाल को अभियोजक के अधिकार मिलने चाहिए। यदि सरकार विपक्ष की यह तीनों बातें मान लेती है, तो एक ओर तो लोकपाल थोड़ा-सा मजबूत हो जाएगा और दूसरी ओर यह विधेयक उस राज्यसभा में भी पारित हो जाएगा, जहां पर सरकार अभी अल्पमत में है। फिलहाल, स्थिति तो यह है कि विपक्ष जहां अपनी, तो वहीं सरकार अपनी जिद पर अड़ी हुई है। बैठक खत्म होने के बाद प्रधानमंत्री ने यह तो कहा है कि सरकार एक मजबूत लोकपाल कानून अवश्य बनाएगी, मगर उन्हें लगता है कि उन्होंने जो लोकपाल विधेयक लोकसभा में पारित करा दिया है, उससे ज्यादा मजबूत तो और कुछ हो ही नहीं सकता। मतलब, सरकार चाहती है कि लोकपाल तो बने, मगर वह ताकतवर न हो।
तब मानना यह भी पड़ेगा कि विपक्ष जो जिद कर रहा है, वह सही है। भ्रष्टाचार से जूझते देश को एक ताकतवर लोकपाल की जरूरत है, न कि किसी खिलौने की और सरकार इसी बात को तो समझना नहीं चाहती। ऐसे में सर्वदलीय बैठक का कोई परिणाम भी नहीं आना था। अलबत्ता, विपक्ष और सत्तापक्ष, दोनों ने ही इस बैठक को सकारात्मक बताया है, तो उम्मीद की जानी चाहिए कि आगे कोई रास्ता भी निकलेगा। दुनिया उम्मीद पर ही कायम है।

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