शुक्रवार, 16 मार्च 2012

कांग्रेस ने नहीं किया सटीक विश्लेषण




- राजेन्द्र चतुर्वेदी

राहुल गांधी सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा आदि के भरोसे थे, तो ये लोग राहुल के जादू के भरोसे। अत: यूपी में कांग्रेस डूब गई।


कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उत्तरप्रदेश में पार्टी की हार का विश्लेषण कर लिया है, पर आधा-अधूरा। सोनियाजी की यह बात सौ फीसदी सही है कि उत्तरप्रदेश में पार्टी का संगठन कमजोर है, तो यह भी कि चुनाव के टिकट देने में गलती हुई। अलबत्ता, बात इन कारणों से जरा और भी आगे बढऩी चाहिए, कांग्रेस के हित में यही है। दरअसल, राहुल गांधी उत्तरप्रदेश में वर्ष-2008 से निरंतर सक्रिय हैं। तब उनका ध्यान कांग्रेस के संगठन को मजबूत बनाने पर क्यों नहीं गया? सिर्फ इसलिए कि वे उत्तरप्रदेश को सलमान खुर्शीद, श्रीप्रकाश जायसवाल और बेनी प्रसाद वर्मा के चश्मे से देख रहे थे। इनमें एक नाम और झांसी के सांसद व केंद्र सरकार में मंत्री प्रदीप जैन आदित्य का भी जोड़ा जा सकता है।
इन सभी महानुभावों की योग्यता सिर्फ यही है कि ये 2009 का लोकसभा चुनाव जीत गए थे और फिलहाल केंद्र में मंत्री हैं। ये वे नेता नहीं, जिनका कोई प्रदेश-व्यापी जनाधार हो। ये राहुल गांधी को 'युवा-हृदय सम्राटÓ व सोनिया गांधी को 'जनप्रिय नेताÓ जैसे विशेषणों से तो नवाज सकते हैं, पर अपने दम पर एक भी विधायक नहीं जिता सकते। बेनी प्रसाद वर्मा के सुपुत्र चुनाव हार गए। सलमान खुर्शीद की पत्नी लुईस की जमानत जब्त हो गई। प्रदीप के गृह नगर झांसी की सीट भी कांग्रेस को न मिल सकी, तो बुंदेलखंड के मसले पर तो उनसे उम्मीद भी क्या थी? मगर, राहुल को इन्हीं सब से उम्मीद थी, जिसका नतीजा कांग्रेस के सामने है। रही-सही कसर इन लोगों व कांग्रेस के दूसरे दिग्गजों के अहंकार ने पूरी कर दी। सलमान खुर्शीद और बेनी प्रसाद वर्मा ने सब कुछ जानकर चुनाव आयोग से पंगा लिया था। फिर जब बेनी बाबू भी पीछे नहीं रहे, तो श्रीप्रकाश जायसवाल भी कैसे पीछे रहते?
लिहाजा, जायसवाल ने तो यहां तक कह दिया कि यदि यूपी में कांग्रेस नहीं, तो फिर राष्ट्रपति शासन लगाया जाएगा। ऐसे ही 'महानÓ विचार दिग्विजय सिंह के थे। इसका जनता में बहुत बुरा संकेत गया। आठ-नौ साल हो रहे हैं, केंद्र की सत्ता में, तो अब वह हजम नहीं हो रही है और उसका अहंकार तो जुबान पर आ ही जाता है। राहुल गांधी ऐसे ही लोगों के भरोसे थे व ये लोग राहुल गांधी के जादू के भरोसे थे। टिकट वितरण में भी इन्हीं की चली। अत: पहले तो रिश्तेदारों को टिकट दिए गए, फिर उनको, जो दूसरे दलों से भागकर आए थे। इसलिए कांग्रेस चारों खाने चित हो गई। रही-सही कसर महंगाई ने पूरी कर दी होगी। यानी, सोनियाजी का विश्लेषण सही है, पर उसमें कसर भी बहुत रह गई है।


बच्चों का उत्पीडऩ हर हाल में रोकना होगा


एनसीपीसीआर की रिपोर्ट साफ करती है कि स्कूलों में बच्चों का उत्पीडऩ हो रहा है। इसको रोकने के माकूल कदम उठाए ही जाने चाहिए।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने स्कूलों में शारीरिक दंड को लेकर जो रिपोर्ट जारी की है, उससे साफ होता है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में भी शिक्षकों का रवैया बच्चों के प्रति बदला नहीं है। हम सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूलों को ज्यादा श्रेष्ठ मानते हैं, मगर यह रिपोर्ट कहती है कि बच्चों को शारीरिक दंड देने के मामले में यह स्कूल भी पीछे नहीं हैं। निजी स्कूलों में 83.6 फीसदी लड़कों व 84.8 फीसदी लड़कियों को किसी न किसी तरह उत्पीडि़त होना पड़ता है, जबकि सरकारी स्कूलों का यह आंकड़ा क्रमश: 70.5 और 72.6 फीसदी का है और ये दोनों आंकड़े यह भी साफ कर देते हैं कि लड़कियों का उत्पीडऩ ज्यादा होता है, जबकि पढऩे-सीखने के मामले में वे लड़कों से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ होती हैं।
इसका कारण क्या है? कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि चूंकि लड़कियों में सहन-शक्ति ज्यादा होती है, इसलिए शिक्षक उन पर अपनी खीज निकालते रहते हैं? राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे सरकारी स्कूलों के बारे में तो रिपोर्ट में इसका भी उल्लेख है कि वहां लड़कियों को अपशब्द भी सुनने पड़ते हैं। यह स्थिति बहुत ही खराब है और लगता है कि इसका कारण वह दुराग्रह हैं, जो भारतीय समाज की अंतर्चेतना में गहरे तक बैठे हैं। जो भी हो, पर मनोवैज्ञानिकों का निष्कर्ष यह भी है कि जिनको बचपन में शारीरिक-मानसिक प्रताडऩा झेलनी पड़ती है, उन व्यक्तियों का समाजीकरण भी ठीक से नहीं हो पाता। स्कूल तो बच्चों को संस्कार देने और उन्हें सामाजिक बनाने के ही स्थान होते हैं, मगर हमारे स्कूलों में जो हो रहा है, वह स्कूल की अवधारणा के कतई अनुकूल नहीं। यह सही है कि बच्चों को शारीरिक-मानसिक पीड़ा से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने एक कानून का मसौदा तैयार कर लिया है, पर क्या यह पर्याप्त है? यह सवाल भी है।

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