मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

अमेरिका की कूटनीति है सईद पर इनाम

- राजेन्द्र चतुर्वेदी हाफिज मोहम्मद सईद के सिर इनाम रखकर अमेरिका जहां भारत का हितैषी बन गया है, तो वहीं पाक पर उसका दबाव भी बढ़ गया है। 26 नवंबर-2008 को मुंबई में हुए भयानक आतंकी हमले के प्रमुख षड्यंत्रकारी और कुख्यात आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तोयबा के संस्थापक हाफिज मोहम्मद सईद को जिंदा या मुर्दा पकडऩे वालों के लिए अमेरिका ने 50 करोड़ रुपए का इनाम देने का ऐलान किया है। मुंबई के आतंकवादी हमले को करीब साढ़े तीन वर्ष हो गए हैं। इस दौरान भारत ने तमाम पापड़ बेले, ताकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय आगे आए और वह पाकिस्तान पर हमलावरों के खिलाफ कार्रवाई करने का दबाव बनाए। वैसे, इस मामले में हमें मुंह-जुबानी समर्थन सभी देशों ने दिया, मगर पाकिस्तान पर ईमानदारी से दबाव किसी ने नहीं बनाया, अमेरिका ने भी नहीं। तब, अब ऐसा क्या हो गया है कि अमेरिका को सईद पर इनाम रखना पड़ा? अमेरिका के ज्ञान-चक्षु खुल गए हैं या फिर इस इनाम -इकराम में उसकी कोई कूटनीतिक चालाकी छिपी हुई है? बेशक, भारत के लिए यह तो राहत की बात है कि अमेरिका द्वारा इनाम रखने के उपरांत सईद पाकिस्तान में छुट्टा नहीं घूम पाएगा। वह छिपेगा नहीं, तो अमेरिका के ड्रोन हमलों के निशाने पर आ जाएगा। पाकिस्तान में सत्ता प्रतिष्ठान, आईएसआई, फौज पर काबिज लोगों सहित नागरिकों का एक बड़ा वर्ग भी अपना जमीर खो चुका है। तब हो यह भी सकता है कि इनाम के लालच में फंसकर पाकिस्तान का ही कोई व्यक्ति सईद को अमेरिका को सौंप दे। पाकिस्तान में ऐसा होता रहा है। जब परवेज मुशर्रफ वहां के राष्ट्रपति हुआ करते थे, तब उन्होंने दो सैकड़ा से ज्याद पाक के नागरिक अलकायदा या तालिबान के सदस्य बताकर अमेरिका को सौंपे थे और एक-एक नागरिक के बदले हजारों डालर वसूले थे। तब ऐसा ही सलूक सईद के साथ क्यों नहीं हो सकता? यानी, सईद को छिपना तो पड़ेगा और यह भारत के लिए एक राहत भी होगी, तो भी हमें इससे खुश नहीं होना चाहिए। अमेरिका ने इनाम का यह जो दांव मारा है, उससे भारत व पाकिस्तान, दोनों चारों खाने चित हो गए हैं। ईरान के मामले में अमेरिका के साथ जाने में अब भारत ज्यादा ठनगन नहीं कर पाएगा, क्योंकि सईद हमारी दुखती हुई रग है। उधर, नाटो फौज की पाकिस्तानी सेना पर गोलाबारी के बाद पाक ने अमेरिका से जो अपना शम्सी एयरबेस खाली करा लिया था, अब पाक सरकार अपने उस निर्णय पर फिर से विचार करेगी, क्योंकि उसे सईद को बचाना है। मतलब, इनाम की इस घोषणा के बाद अमेरिका के दोनों हाथों में लड्डू आ गए हैं। उसने यह काम हमारे लिए नहीं, बल्कि अपने लिए किया है। कहीं ये पड़ौस के दुर्गुणों का असर तो नहीं! देश में फिर हड़कंप मचा हुआ है। दरअसल, एक अखबार ने खबर दी है कि 16 जनवरी की रात सेना की दो टुकडिय़ां दिल्ली की ओर बढ़ी थीं। देश में एक बार फिर हड़कंप मच गया है। दरअसल, अंग्रेजी के एक अखबार ने खबर दी है कि 16 जनवरी की रात सेना की दो टुकडिय़ां दिल्ली की ओर बढ़ी थीं। तब सरकार के हाथ-पांव फूल गए थे। बहरहाल, इस खबर का खंडन कोई नहीं कर रहा है, कोई नहीं कह रहा है कि यह खबर झूठी है। इस विषय में हमारे प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री ने जो भी कहा है, उसका सारांश यह है कि सेना ऐसा कुछ नहीं करेगी, जिससे देश के लोकतंत्र पर आंच आए। प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री की यह बात गलत नहीं है। हमारी सेना निश्चित ही लोकतांत्रिक है, मगर इन दोनों महाशयों के इस बयान से इस सवाल का उत्तर नहीं मिलता कि सेना की टुकडिय़ां दिल्ली की ओर बढ़ी थीं या नहीं और अगर बढ़ी थीं, तो क्यों? नहीं लगता कि इस सवाल का जवाब देश को मिलेगा भी? खैर, जो भी हो। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, पर उसका जैसा आभा -मंडल होना चाहिए था, वैसा नहीं है, क्योंकि हमारी राजनीतिक जमातें लोकतंत्र को कमजोर करने में ही लगी हुई हैं। हमारी चमक तब बढ़ती, जब यहां नागरिकों को समय पर न्याय मिलता, सभी तरह की व्यवस्थाएं दुरुस्त होतीं। मगर, हम अभी ऐसे देश नहीं बन पाए हैं। हमारे यहां इतना लोकतंत्र है कि समय पर चुनाव होते हैं और लोगों को एक हद तक बोलने की आजादी मिली हुई है। नतीजा, आस-पड़ौस पर हमारा कहीं कोई प्रभाव नहीं है। हमारे पड़ौस में जितने भी देश हैं, हम उनके लिए आदर्श नहीं बन पाए, जबकि किसी भी लोकतांत्रिक देश को अपने पड़ौसियों के लिए आदर्श बनना ही चाहिए। तब संभव है कि पड़ौस का प्रभाव हमारी सेना पर पड़ा हो। हमारे सभी पड़ौसी देशों में सत्ता में सेना की प्रभावशाली प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका है। जब हम अपने सद्गुणों की छाप उन पर नहीं छोड़ पाएंगे, तो वहां के दुर्गुण हमारे यहां आएंगे ही। तब हो सकता है कि यह खबर भी सच हो।

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