शनिवार, 14 अप्रैल 2012

धमकी की भाषा क्यों बोल रहा है श्रीलंका?

श्रीलंका ने कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का मुद्दा आईएईए में ले जाने की जो धमकी दी है, वह तो हास्यास्पद ही है, पर उसने हमें धमकाया क्यों? लो, श्रीलंका ने भी हमारे खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। जिस दिन भारत ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में श्रीलंका के खिलाफ मतदान किया था, तमिलों पर हुए अत्याचार के मामले में अमेरिका द्वारा लाए गए प्रस्ताव पर, उसी दिन अनुमान हो गया था कि अब श्रीलंका भारत के खिलाफ हो जाएगा, पर यह सब जल्दी होगा, यह अनुमान किसी को नहीं था। बहरहाल, अब श्रीलंका को हमारे कुडनकुलम परमाणु संयंत्र पर आपत्ति है। उसे लगता है कि इस परमाणु संयंत्र में कभी कुछ गड़बड़ हुई, तो इससे उसका भी नुकसान होगा। लिहाजा, श्रीलंका की सरकार ने साफ कर दिया है कि वह कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का मसला अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) में उठाने जा रही है। यानी, श्रीलंका हमारे खिलाफ बदले की भावना से कार्य करने की तैयारी में है। यह सही है कि कुडनकुलम परमाणु संयंत्र का विरोध हमारे यहां भी हो रहा है, मगर हमारे अपने लोगों और श्रीलंका के विरोध में भारी फर्क है। हमारे अपने लोग तो इस परमाणु संयंत्र के विरुद्ध उसी दिन से हैं, जिस दिन से इसकी बुनियाद रखी गई थी, लेकिन श्रीलंका को इसका पता अभी दो-तीन दिन पहले ही चला है कि यह परमाणु संयंत्र उसके लिए भी नुकसानदायक है। यही पर्याप्त है, यह जानने के लिए कि लंका बदले की भावना से काम करने की तैयारी में है। इधर, हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि जो देश या व्यक्ति बदले की भावना से ग्रस्त हो जाता है, उसका विवेक काम करना बंद कर देता है। हम देख सकते हैं कि श्रीलंका भी तो विवेकहीन आचरण ही कर रहा है। श्रीलंका सरकार के जिन लोगों ने कुडनकुलम का मामला आईएईए में ले जाने की धमकी दी है, उन्हें अंतरराष्ट्रीय कानूनों का ज्ञान ही नहीं है, यह बात दावे से कही जा सकती है। वरना वे ऐसी धमकी नहीं देते, जो उनकी जगहंसाई कराए। दरअसल, यह परमाणु संयंत्र आईएईए की अनुमति से ही बना है। तब वहां इस विषय पर विचार हो ही नहीं सकता। फिर, लंका आईएईए का सदस्य भी नहीं है, तब वह यह मुद्दा वहां कैसे ले जाएगा? मतलब, उसकी इस धमकी का अर्थ यही है कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे। हां, हमारे लिए यह अवश्य ही विचारणीय है कि हमें हर कोई धमकाने क्यों लगता है? हम दुनिया की एक परमाणु ताकत हैं, तो भी पिद्दी-से देश हमें यदि कमजोर समझते हैं, तो इसका कारण क्या है? हम इन कारणों का न केवल पता लगाएं, बल्कि उनका निराकरण भी करें, जरूरी यह है। वरना, हमारे पास परमाणु बम होने का क्या मतलब? एसआईटी की रिपोर्ट ने दी मोदी को राहत गुलबर्ग सोसाइटी कांड में एसआईटी को मोदी समेत 62 लोगों के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। यह मोदी के लिए एक बड़ी राहत है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा चर्चाओं में रहते हैं, किसी न किसी संदर्भ में। अभी हाल ही में अमेरिकी पत्रिका टाइम ने बताया था कि वे लोकप्रियता के मामले में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से भी आगे हैं। तब उनको लेकर तमाम चर्चाएं हुई थीं। टाइम की इस रिपोर्ट का सभी ने अपने-अपने हिसाब से अर्थ लगाया था। बहरहाल, मोदी इस बार अगर फिर चर्चा में हैं, तो इसकी वजह यह है कि उन्हें गुजरात दंगों के उस मामले में क्लीन चिट मिली है, जिसमें उन्हें आरोपी बनाने की कोशिश की गई थी। गौरतलब है कि वर्ष-2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस को जलाए जाने के बाद गुजरात में जो सांप्रदायिक दंगे हुए थे, वे देश के माथे पर एक कलंक ही हैं। एक सामूहिक नरसंहार अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी में भी हुआ था, जहां पर दंगाइयों की भीड़ ने आग लगा दी थी, इस कारण 69 लोगों की मौत हो गई थी। मरने वालों में कांग्रेस के सांसद रहे एहसान जाफरी भी शामिल थे। इस मामले में मोदी सहित 62 लोगों को आरोपी बनाने की याचिका जाकिया जाफरी (स्व. एहसान जाफरी की पत्नी) द्वारा दायर की गई थी और सुप्रीम कोर्ट ने मोदी पर लगे आरोपों की जांच विशेष जांच दल यानी एसआईटी से कराई थी। एसआईटी की यही जांच रिपोर्ट बताती है कि जांच करने वालों को मोदी समेत 62 लोगों पर लगाए गए आरोपों के संदर्भ में कोई सबूत नहीं मिले। रिपोर्ट के इसी निष्कर्ष को मोदी के लिए क्लीन चिट माना जा रहा है और जो है भी। यह सही है कि एसआईटी की रिपोर्ट पर भी अहमदाबाद की निचली अदालत जाकिया जाफरी का पक्ष सुनेगी, तभी कोई निष्कर्ष निकालेगी। मगर, सच यह भी है कि फिलहाल तो मोदी को राहत ही मिली है। इधर, राहत की सांस भाजपा ने भी ली है। दरअसल, गुजरात के दंगों का प्रेत जितना मोदी को हैरान किए हुए है, उतना ही भारतीय जनता पार्टी को भी। - राजेन्द्र चतुर्वेदी

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