सोमवार, 30 अप्रैल 2012

एयर चीफ मार्शल के बयान के निहितार्थ

- राजेन्द्र चतुर्वेदी
यदि हमारे वायुसेना प्रमुख को देश को तालिबान के खतरे बताने पड़ रहे हैं, तो शायद इसका अर्थ यही है कि सरकार इसकी अनदेखी कर रही है! हमारे वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एनएके ब्राउन ने जो कुछ कहा है, उसमें नया कुछ नहीं है। उन्होंने देश का ध्यान उसी चिंता की ओर खींचा है, जो चिंता हमारा दरवाजा खटखटा रही है। उन्होंने आखिर यही तो कहा है कि नाटो सेनाओं के चले जाने के बाद अफगानिस्तान में एक बार फिर अराजकता फैल सकती है, क्योंकि तालिबान वहां की सत्ता को हड़पने की कोशिश कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान का भी धीरे-धीरे तालिबानी -करण हो रहा है और जब पाकिस्तान और अफगानिस्तान में इन लोगों का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा, तो इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। कुल मिलाकर ये सब वही बातें हैं, जिन्हें भारत पहले से ही जानता है। तब, एयर चीफ मार्शल ने यह सब कहा क्यों? जाहिर है कि वे खबरों में आने के लिए कुछ नहीं कह सकते। लगता है कि एयर चीफ मार्शल इससे चिंतित हैं कि भारत की सरकार तालिबान के खतरे की अनदेखी कर रही है। कौन नहीं जानता कि तालिबान के पाकिस्तानी फौज और आईएसआई से तो संबंध हैं ही, हम पाकिस्तान में सक्रिय अन्य आतंकवादी संगठनों को भी तालिबान से अलग नहीं मान सकते, क्योंकि इन सभी संगठनों का लक्ष्य एक ही है-दुनिया को एक मजहब विशेष के झंडे के नीचे लाना। यानी, सभी संगठन आपस में मौसेरे भाई हैं। तब भारत सरकार को इस खतरे से निपटने की कोई पूर्व-तैयारी भी तो करनी चाहिए, पर लगता है कि वह कर कुछ नहीं रही है? सही है कि तालिबान हमारी सेना से सीधी टक्कर नहीं ले सकते, पर इस आशंका को भी खारिज नहीं किया जा सकता है कि वह जब अफगानिस्तान में मजबूत हो जाएंगे, तो कश्मीर में भी उत्पात मचाएंगे। इस आशंका से निपटने की हमारी रणनीति क्या है? जरूरी नहीं है कि सरकार अपनी रणनीति को देश को बताए ही। सामरिक मामलों में बहुत कुछ ऐसा होता है, जिसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता और न ही उसे सार्वजनिक किया भी जाना चाहिए, मगर खतरे की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए। खतरे की अनदेखी की आशंका इसलिए हो रही है, क्योंकि एयर चीफ मार्शल को देश को तालिबान के खतरे बताने पड़े हैं। यदि सरकार की इससे निपटने की तैयारी होती, तो एयर चीफ मार्शल पूरे देश को चिंतित करने वाले विषय पर चर्चा क्यों करते? देशवासी नहीं भूल सकते कि हम ऐसे पड़ौसियों के साथ रह रहे हैं, जिनमें से दो यानी पाकिस्तान व अफगानिस्तान का भविष्य उज्ज्वल नहीं माना जा सकता। तब उनका चिंतित होना भी स्वाभाविक है।

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